मशहूर साहित्यकार व कवि डॉ. केदारनाथ सिंह के निधन से लोगों को गहरा आघात पहुंचा है। उनके गृह जिले बलिया में बचपन में उनके सहपाठी रहे आचार्य रमाशंकर तिवारी से मंगलवार को सुबह मिलने वाले लोगों से बस एक ही रट लगाए जा रहे थे कि कुछ भूल गया है, लगता है कि कुछ भूल गया है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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kedarnath singh
अपने सहपाठी साहित्यकार की यादों को ताजा करते हुए कहा कि वे गांव आते थे तो बहुत प्रसन्न रहते थे। गांव आते ही कहते थे कि जब मैं गांव आता हूं तो लगता है मेरा बचपन लौट आया है। उन्हें सारी असुविधाओं के बाद भी गांव में खूब आनन्द आता था।
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बचपन को याद करते हुए आचार्य रमाशंकर तिवारी ने कहा कि मैं और केदारनाथ जी वाराणसी बीएचयू में पढ़ने के लिए एक ही ट्रेन पर एक साथ जाते थे। उस समय चकिया गांव में कोई विद्यालय नहीं था। जिस कारण तिवारी के मिल्की महाराज बाबा के पास प्राथमिक विद्यालय में कक्षा एक से पांचवी तक का शिक्षा ग्रहण की।
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रमाशंकर तिवारी बताते है कि बाबा लक्ष्मण दास द्वाबा राष्ट्रीय इन्टर कालेज में पढ़ाई करने के बाद वे यूपी कालेज वाराणसी पढ़ने चले गए। वहां एक नम्बर हास्टल में उनका एक नम्बर रूम था। फिर बीएचयू में केदारनाथ ने साहित्यिक हिन्दी व मैंने संस्कृत का पढ़ाई पूरा किया। बाद में केदारनाथ जी ने पीएचडी भी की।
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साहित्यकार केदारनाथ सिंह के भतीजे शैलेश कुमार सिंह बताते है कि चाचा जी अंतिम बार अभी पिछले 20 नवम्बर को गांव आये थे और 28 नवम्बर तक गांव में ही रहे। वे वर्ष में दो से तीन बार गांव आते थे। जनवरी में जब दिल्ली में ज्यादा ठंड पड़ती थी उस समय वे अपनी बेटी के पास कोलकत्ता चले जाते थे।
विगत 18 जनवरी को कोलकत्ता में ही चाचा जी का तबियत खराब हुई, तब से वे बीमार चल रहे थे। दूसरे भतीजे बद्रीनाथ सिंह ने कहा कि चाचा जी को अपने गांव से बड़ा लगाव था। यहां तक कि वे जब अन्तिम बार गांव आये थे तो बाजार चलने के लिए कहा। हमलोग उन्हें बाइक पर बाजार ले जाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने डांटते हुए कहा कि पैदल चलने में जो मजा है गाड़ी पर कहां। चाचा जी पैदल ही रानीगंज बाजार जाते थे व पैदल ही आते थे।