जर्जर हालत से परेशान हैं ग्रामीण।
- फोटो : संवाद
हर साल रंग-रोगन, फिर भी नहीं सुधरी मूल समस्या
नरौली के अंत्येष्टि स्थल को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि कई बार साफ-सफाई और रंग-रोगन कराया जाता है, लेकिन पहुंच मार्ग की समस्या जस की तस है। ग्रामीणों का सवाल है कि जिस स्थल तक शव लेकर पहुंचना ही संभव नहीं है, वहां भवन बनाकर और उसके रखरखाव पर खर्च करने से योजना का उद्देश्य कैसे पूरा होगा। ग्रामीणों ने पूरे मामले की जांच कराने और अंत्येष्टि स्थल तक स्थायी रास्ते की व्यवस्था कराने की मांग की है।
गंगा किनारे खुले में अंतिम संस्कार की मजबूरी
शवदाह गृहों के निर्माण का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार के लिए व्यवस्थित स्थान उपलब्ध कराने के साथ गंगा को प्रदूषण से बचाना भी था। लेकिन बलुआ में शवदाह चेंबर के इस्तेमाल में नहीं आने और नरौली में पहुंच मार्ग न होने के कारण लोग खुले गंगा घाट पर ही अंतिम संस्कार करते हैं। इससे सरकारी योजना की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि बने हुए शवदाह गृहों को उपयोग लायक बनाया जाए तो लोगों को सुविधा मिलने के साथ नदी किनारे खुले में होने वाले अंतिम संस्कार को भी कम किया जा सकता है।
ग्रामीण बोले, जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए
14 लाख से बने अंत्येष्टि स्थल का वर्षों से ग्रामीणों को लाभ नहीं मिल रहा है। निर्माण के समय ही रास्ते की व्यवस्था कर दी जाती तो आज लोग इसका इस्तेमाल कर रहे होते। उन्होंने मामले की जांच कराने और स्थायी पहुंच मार्ग बनाने की मांग की। - हरिकेश कुमार गौतम, नरौली
लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों को सुविधा नहीं मिल सकी। जब स्थल तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं था तो निर्माण से पहले उसकी उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए था। उन्होंने जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की। - विपिन रस्तोगी, निवासी, धानापुर
14 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद 11 साल में एक भी शवदाह नहीं हुआ। उन्होंने सवाल उठाया कि रास्ता नहीं होने के बावजूद निर्माण कैसे करा दिया गया। बड़े घोटाला का अंदेशा है। - अनूप कुमार, धानापुर
अंत्येष्टि स्थल सरकारी योजना की हकीकत बयां कर रहा है। लाखों रुपये खर्च हुए, लेकिन ग्रामीणों के लिए आज भी रास्ता नहीं है। जिम्मेदार अधिकारियों को जवाब देना चाहिए कि बिना पहुंच मार्ग के निर्माण की अनुमति आखिर कैसे मिली। मामले की निष्पक्ष जांच जरूरी है। - अमित सिंह, नरौली