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लॉकडाउन के 5 माह: काशी विश्वनाथ मंदिर में कभी रहता था गुलजार,  देखें कोरोना से पहले और अभी की स्थिति

Mon, 24 Aug 2020 12:39 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
भगवान शिव की प्रिय नगरी काशी। दुनिया का सबसे प्राचीन शहर। राजराजेश्वर स्वरूप में यहीं विराजते हैं श्री काशी विश्वनाथ। द्वादश ज्योर्तिलिंग में प्रमुख स्वर्णमंडित शिखरों से युक्त बाबा के मंदिर में बारहों महीने भक्तों की कतार लगी रहती है। 24 मार्च के जनता कर्फ्यू और कोरोना महामारी ने हालात बदल दिए हैं।
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काशी विश्वनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला
श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में जहां पहले सामान्य दिनों में 30 से 35 हजार भक्त दर्शन-पूजन करते थे, वहीं अब यह आंकड़ा सैकड़े में भी नहीं पहुंच रहा है। बात करें सावन में तो मात्र 50 हजार भक्तों ने ही बाबा के दरबार में हाजिरी लगाई। सावन के सोमवार पर जहां डेढ़ से दो लाख भक्त पहुंचते थे।
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काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में रखा जा रहा सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल। - फोटो : अमर उजाला।
वहीं इस बार यह संख्या तीन से चार हजार ही रही। हर-हर, बम-बम से गुलजार रहने वाली काशी की गलियों और सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहा। अनलॉक में भी भक्तों की संख्या गिनती की ही रह गई है। शहर के प्रमुख मंदिरों का भी यही हाल है। हालांकि संकटमोचन, दुर्गामंदिर समेत कई मदिर व शिवालय में आम भक्तों का प्रवेश बंद हैं। जैन समुदाय ने भी पर्युषण पर्व में मंदिरों के कपाट आम श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोले।

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काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा के लिए जाते श्रद्धालु - फोटो : ANI
24 मार्च से कोरोना संक्रमण के कारण बंद हुए काशी विश्वनाथ के कपाट 9 जून को बाबा दरबार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए थे। इस दौरान कुछ शर्तों के साथ ही भक्तों को बाबा दरबार में प्रवेश दिया जा रहा है। श्रद्धालु इस दौरान मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हैं।
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काशी विश्वनाथ का तिरंगा श्रृंगार
दो हिस्सों में बंटा हुआ है ज्योर्तिलिंग
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग दो हिस्सों में बंटा हुआ है। दाहिने हिस्से में शक्ति के रूप में मां भगवती विराजती हैं। वहीं दूसरी तरफ भगवान शिव वाम रूप में विराजमान हैं। माना जाता है कि यहां आकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। विशेष बात ये है कि इस ज्योतिर्लिंग में शिव और शक्ति दोनों साथ ही विराजते हैं और ऐसा अद्भुत संयोग दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता है।
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काशी विश्वनाथ मंदिर
तांत्रिक सिद्धि के लिए प्रसिद्ध है मंदिर
विश्वनाथ दरबार में ऊपर की ओर गुंबद श्री यंत्र से मंडित है और इसे तांत्रिक सिद्धि के लिए उपयुक्त स्थान माना जाता है। तंत्र साधना के लिए यहां बहुत से साधु-संन्यासी आते हैं। एक और दिलचस्प बात ये है कि बाबा विश्वनाथ के दरबार में चार प्रमुख द्वार हैं शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार। इन चारों द्वारों का तंत्र विद्या में अलग से वर्णन मिलता है। पूरी दुनिया में यही एक ऐसा स्थान है, जहां शिवशक्ति एक साथ विराजमान हैं और तंत्र द्वार भी हैं।
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श्री काशी विश्वनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
ईशान कोण में स्थित हैं बाबा विश्वनाथ
गर्भ गृह में ज्योतिर्लिंग ईशान कोण में स्थित है और मंदिर का मुख्य द्वार दक्षिण की ओर है। इससे यहां प्रवेश करते हुए श्रद्धालुओं को बाबा के अघोर रूप का दर्शन होते हैं, साथ ही समस्त पापों से भी मुक्ति मिलती है। ऐसा माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ का मंदिर उनके त्रिशूल पर विराजमान है, इसीलिए यहां कभी प्रलय नहीं आ सकती।

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सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क लगाकर लाइन में खड़े श्रद्धालु। - फोटो : अमर उजाला।
गुरू और राजा के रूप में विराजते हैं बाबा विश्वनाथ
मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजते हैं। दिन में वह काशी में गुरू रूप में और रात नौ बजे अपनी श्रृंगार आरती के बाद राज वेश में भ्रमण करते हैं। यही वजह है कि यहां शिव को राज-राजेश्वर भी कहा जाता है।

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अहिल्या बाई ने कराया था मंदिर का पुनर्निमाण
इस मंदिर का पुनर्निर्माण इंदौर की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया था। माना जाता है कि 18वीं सदी में स्वयं भगवान शिव अहिल्या बाई को सपने में दिखाई दिए थे और उन्हें इस जगह मंदिर निर्माण के लिए कहा था। रानी अहिल्या बाई ने जब इस मंदिर की पुर्नप्रतिष्ठा की थी, उसके कुछ साल बाद महाराज रणजीत सिंह ने मंदिर में सोना दान किया था। माना जाता है कि महाराज रणजीत ने लगभग एक टन सोना इस मंदिर में दान कर दिया था और उसी से मंदिर के छत्रों पर सोना चढ़ाया गया था।
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kashi vishwanath corridor
तीन बार हुआ था मंदिर का पुनर्निर्माण
बाबा विश्वनाथ के इतिहास से जुड़ीं कई ऐसी बातें हैंए जिनकों शायद बहुत कम लोग ही जानते होंगे। डॉ. एएस भट्ट ने अपनी किताब दान हारावली में इसका जिक्र किया है कि बादशाह अकबर के बाद टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण 1558 में करवाया था। 1669 में औरंगजेब ने आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी। 1777 में इंदौर की राजकुमारी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया गया था।
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