तिब्बती धर्मगुरु परमपावन दलाई लामा अपने चार दिवसीय प्रवास पर शुक्रवार को काशी आ रहे हैं। वे केंद्रीय तिब्बती अध्ययन संस्थान के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में हिस्सा लेंगे। आगे की स्लाइड्स देखें...
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दलाई लामा काशी प्रवास
- फोटो : अमर उजाला
परमपावन दिल्ली से चलकर पूर्वाह्न 11:35 बजे बाबतपुर एयरपोर्ट पहुंचेंगे और वहां से उनका काफिला सारनाथ के लिए रवाना होगा। दोपहर 12:20 बजे वे सारनाथ स्थित केंद्रीय तिब्बती अध्ययन संस्थान परिसर में पहुंचेंगे। कुलपति प्रो. गेशे नवांग समतेन के अनुसार धर्मगुरु दलाईलामा 30 दिसंबर को संस्थान में आयोजित ‘माइंड इन इंडियन फिलोसॉफिकल थॉट्स एंड मॉडर्न साइंस’ विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में हिस्सा लेंगे।
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दलाई लामा काशी प्रवास
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सुबह नौ बजे से दोपहर 12 बजे तक आयोजित सेमिनार को संबोधित भी करेंगे। अगले दिन 31 दिसंबर को पुन: सुबह नौ से दोपहर 12 बजे तक सेमिनार में शामिल होंगे। एक जनवरी, 2018 को नए साल के पहले दिन संस्थान की 50वीं जयंती पर सुबह 09:30 से 11:30 बजे तक आयोजित समारोह में शिरकत करेंगे। इसी दिन दोपहर में बोध गया के लिए हवाई मार्ग से रवाना हो जाएंगे।
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dalai lama
दोपहर डेढ़ बजे वे बाबतपुर एयरपोर्ट से चार्टर्ड प्लेन से बोध गया जाएंगे। परमपावन के आगमन के मद्देनजर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। संस्थान के ही गेस्ट हाउस में उनके रहने की व्यवस्था की गई है। उनके आगमन के मद्देनजर संस्थान की सुंदर साज-सज्जा की गई है। बौद्ध धर्म की हृदयस्थली सारनाथ में स्थापित केंद्रीय तिब्बती अध्ययन संस्थान अपने 50 साल पूरे कर रहा है।
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दलाई लामा काशी प्रवास
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संस्थान के इस स्वर्णिम इतिहास के साक्षी स्वयं तिब्बती धर्मगुरु परमपावन दलाईलामा होंगे, जिन्होंने 1967 में इस संस्थान की नींव रखी थी। संस्थान जब संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक संघटक विभाग के तौर पर शुरू हुआ तब और आज जब इसने संस्थान से लेकर मानद विश्वविद्यालय तक का सफर तय किया और अब ये अपनी स्वर्ण जयंती मना रहा है, तब भी दलाई लामा इस खास मौके पर शिरकत कर रहे हैं। परमापावन दलाई लामा ने ही पांच दशक पहले इस संस्थान की परिकल्पना की थी।
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दलाई लामा काशी प्रवास
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इसके लिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से चर्चा की। सरकार की मुहर लगते ही वर्ष 1967 में इस परिकल्पना को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक विभाग के तौर पर साकार कर दिया गया। 1970 में सारनाथ में बतौर संस्थान इसे स्थापित किया गया। 1988 में इसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। 2008 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय किया गया। 15 जनवरी 2009 में इसके नाम का लोकार्पण भी स्वयं दलाईलामा ने ही किया।
परमपावन के आगमन के मद्देनजर जहां संस्थान का कोना-कोना दुलहन की तरह सज गया है। स्वर्ण जयंती के अवसर पर संस्थान में अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होगा जिसमें दलाई लामा का मुख्य संबोधन होना है। इसके लिए संस्थान परिसर में ही वृहद पंडाल बनाया गया है। मंच पर 14 बाई 70 फुट का डिस्प्ले लगाया गया है। संस्थान की वेबसाइट पर दलाई लामा का संबोधन लाइव होगा।