चंबल घाटी में 556 डाकुओं के सरगना एवं दो करोड़ के इनामी डाकू पंचम सिंह चौहान अब बाबा बन गए हैं। डाकू पंचम सिंह से बाबा पंचम सिंह बनने का सफर आसान नहीं था। आगे की स्लाइड में जानें पूरी कहानी...
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- फोटो : अमर उजाला
साल 1958 की बात है। मध्य प्रदेश के भिंड जिला अंतर्गत सिंहपुरा में ग्राम पंचायत चुनाव के दौरान पंचम सिंह को बेरहमी से मारापीटा गया और बैलगाड़ी से थाने ले जाया गया। पंचम सिंह ने इस अपमान और मारपीट का बदला लेने की ठानी। पंचम ने बदले की आग में कुछ ऐसा कर दिया जिससे उन्हें बीहड़ की शरण लेनी पड़ी।
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पंचम सिंह 36 साल की अवस्था में गांव के छह लोगों को गोली मारकर चंबल घाटी जा पहुंचे और डकैत बन गए। धीरे-धीरे चंबल से सटे इलाके में उनकी तूती बोलने लगी। उनके खौफ का आलम यह था कि वर्ष 1970 में उनके ऊपर दो करोड़ रुपये का इनाम रख दिया गया।
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वर्ष 1972 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोक नायक जय प्रकाश नारायण को संदेशवाहक के रुप में भेजा और पंचम सिंह को समर्पण करने के लिए कहा। डाकुओं ने आठ मांगें रखी गई जिसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया। इसके बाद 556 डाकू साथियों के साथ समर्पण कर दिया।
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इन डाकू पंचम सिंह पर हत्या के 100 और अपहरण डकैती के 200 मुकदमें थे। 1973 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। लेकिन शर्त के मुताबिक जय प्रकाशन नारायण ने अपील की और राष्ट्रपति के यहां से फांसी की सजा को कारावास बदल दिया गया। इसके बाद डाकू पंचम सिंह का बाबा पंचम सिंह बनने का सफर शुरू हुआ।
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जेल में बंद रहने के दौरान ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय आश्रम के लोगों के जरिए बंदियों को उपदेश दिया जाता था। करीब तीन साल तक विचार सुनने के बाद सभी 556 डाकू मुख्य धारा से जुड़ गए। पंचम सिंह ब्रम्हाकुमारी प्रजापिता ईश्वरीय विश्वविद्यालय आश्रम के सानिध्य में आए कि जिससे इनकी दिनचार्या ही बदल गई।
96 वर्ष की अवस्था में अब देश भर में विशेष तौर पर जेलों में जाकर बंदियों और कैदियों से संपर्क करके अपनी गाथा सुनाकर दिनचर्या में परिवर्तन कराकर आश्रम से जुडने का आह्वान कर रहे। पंचम बाबा ने कहा कि डकैत रही फूलन देवी को भी समर्पण कराया गया था। इसी का नतीजा है कि वर्तमान समय में चंबल घाटी में एक भी डाकू नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि एकबार उनके साथी ने एक किसान की बेटी के साथ गलत कर दिया था तो उसे खुलेआम जिंदा जला दिया था।