संगीत के शहर बनारस में आज शहनाई के जादूगर भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को उनकी 11वीं पुण्यतिथि पर याद किया गया। इस दौरान गंगा-जमुनी तहजीब भी देखने को मिली। आगे की स्लाइड में पढ़ें पूरी खबर...
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Bismillah Khan
- फोटो : अमर उजाला
संगीत प्रेमी हों या साहित्य, कला, राजनीति के पुरोधा, सभी उस्ताद को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए उनके मकबरे पर पहुंचे। उस्ताद के मकबरे पर सभी धर्मों के लोगों ने नमन किया।
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Bismillah Khan
- फोटो : अमर उजाला
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई एकेडमी की ओर से दरगाहे फातमान पर उस्ताद की पुण्यतिथि मनाई गई। इस दौरान दुआख्वानी के साथ भगवान गणेश और माता सरस्वती की वंदना भी हुई।
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को भारत रत्न
उस्ताद के मकबरे पर फूलों की चादर चढ़ाई गई। उस्ताद की मानस पुत्री ठुमरी गायिका पद्मश्री डॉ. सोमा घोष कहती हैं कि उन जैसी सहजता और सुरों की गमक कहीं नहीं मिलती। उनकी स्मृति में शहनाई एकेडमी की स्थापना जल्द होनी चाहिए।
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बिस्मिल्लाह खां
भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान साहब का इंतकाल 21 अगस्त 2006 में हुआ था। भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति की फिजा में शहनाई के मधुर स्वर घोलने वाले भारत रत्न बिस्मिल्ला खान शहनाई को ही अपनी बेगम कहकर बुलाते थे।
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उस्ताद बिस्मिल्ला खां
- फोटो : ANI
उस्ताद का जन्म बिहार प्रदेश के डुमरांव के ठठेरी बाजार में 21 मार्च 1916 को हुआ था। आठ वर्ष की उम्र में वो वाराणसी आ गए और यही के होकर रह गए। बिस्मिल्लाह खान को वर्ष 2001 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। वह तीसरे भारतीय संगीतकार थे जिन्हें इस अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां
- फोटो : SELF
उस्ताद को मोक्षदायिनी गंगा से बेहद लगाव था। वे मानते थे कि उनकी शहनाई के सुरों में जब गंगा की धारा से उठती हवाएं टकराती थीं तो धुन और मनमोहक हो उठती थी। यही वजह थी कि मुंबई जब बॉलीवुड की शक्ल ले रहा था तो उनके पास हमेशा के लिए वहीं बसने के प्रस्ताव आए, इस पर उस्ताद का एक ही जवाब होता था, अमा यार ले तो जाओगे, लेकिन वहां गंगा कहां से लाओगे।
आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अल सुबह बजने वाली मंगल ध्वनि उस्ताद बिस्मिला खान की शहनाई की तान है। एक समय था जब इस मंगल ध्वनि से ही पूरे देश की सुबह होती थी। उनके उपर लिखित किताब के मुताबिक, सुबह और शाम के अलग अलग सात रागों को तीन तीन मिनट के लिए मंगल ध्वनि बजाया गया है। बीते वर्षों में चौदह रागों का यह संग्रह अब आकाशवाणी और दूरदर्शन के मंगल ध्वनि का पर्याय बन चुका है।