मुंह में स्वाद और मिठास घोल देने के लिए लंगड़ा आम का सिर्फ नाम ही काफी है। गर्मी शुरू होते ही आम की मीठी सुगंध जैसे हवाओं में घुल जाती है। बनारसी लंगड़ा की मिठास और महक के दीवाने विदेशों तक हैं। लंगड़ा से लेकर दशहरी तक और तोतापरी से लेकर केसर तक, हर आम के पीछे एक खास कहानी और बात है। लंगड़ा आम की उत्पति बनारस से हुई है। आइये आज आपको बताते हैं आम का नाम लंगड़ा कैसे पड़ा?....
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langraa aam
- फोटो : अमर उजाला
वैसे तो देश-दुनिया में बनारस कई चीजों के लिए मशहूर है। उन्हीं में एक है आम की प्रजाति बनारसी लंगड़ा। यह प्रसिद्ध किस्म कभी वाराणसी जिले में छह हजार हेक्टेयर तक फैली थी लेकिन समय के साथ इसकी उपज सिमटती गई। फिलहाल तकरीबन 1700 हेक्टेयर में बनारसी लंगड़ा की उपज होती है।
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- फोटो : self
बनारसी लंगड़ा, आम के शौकीनों के लिए बस इसका नाम ही काफी है। जिक्र आते ही उन्हें जुबां पर इसकी मिठास घुलने सा अहसास होने लगता है। फलों के राजा आम की इस बेहद खास प्रजाति के शौकीनों के लिए अबकी अच्छी खबर यह है कि इस समय इसके पेड़ बौर से लद गए हैं। बौर की बहार से अबकी बेहतर पैदावार की उम्मीद जताई जा रही है।
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- फोटो : twitter
बनारस के चिरईगांव में इसकी सबसे अधिक पैदावार होती है। आराजीलाइन, काशी विद्यापीठ, हरहुआ, बड़ागांव, सेवापुरी सहित आठों ब्लॉकों में इसके बगान हैं। जिला उद्यान अधिकारी संदीप कुमार गुप्ता ने बताया कि जिले में 1700 हेक्टेयर रकबे में बनारसी लंगड़ा आम के बगान हैं।
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आम का बगीचा
किवदंतियों के अनुसार, ढाई सौ साल पहले शहर के एक शिव मंदिर में कोई साधु आए। मंदिर के पुजारी के आग्रह पर कुछ दिन वहीं ठहर गए। इस दौरान साधु ने मंदिर परिसर में आम का एक पौधा लगाया। जाते समय पुजारी को उस आम के पेड़ की देखभाल करते रहने को कहा। पुजारी ने वैसा ही किया।
कुछ वर्षों बाद जब फल लगे तो उनका स्वाद आम की दूसरी किस्मों से अलग था। साधु लंगड़ाकर चलते थे। उनके नाम पर इसका नाम लंगड़ा आम पड़ गया। कुछ ही वर्षों में दूरदराज से लोग इसका स्वाद लेने यहां आने लगे और इसकी खेती का विस्तार पूरे जिले में हो गया।