धर्म और संस्कृति का शहर बनारस संस्कारों के लिए जाना जाता है। बात चाहे यहां मन मिजाज की हो, रहन सहन की हो या यहां के पर्व-त्योहार की। इन सब में बनारसी रंग नजर आता है। त्रलोक्य से न्यारी काशी नगरी की परंपराएं अनूठी, प्यारी और मनोहरी है। इस धर्मनगरी में होली बाबा विश्वनाथ दरबार से शुरु होती है। आगे की स्लाइड्स में जानिए यहां मनाए जाने वाले खास पर्व होली के बारे में ....
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होली
- फोटो : अमर उजाला
भांग, पान और ठंडई की जुगलबंदी के साथ अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़बाजी के रंगों में घुली बनारसी होली की बात ही निराली है। फागुन का सुहानापन बनारस की होली में ऐसी जीवंतता भरता है कि फिजा में रंगों का बखूबी अहसास होता है। बाबा विश्वनाथ की नगरी में फगुनी बयार भारतीय संस्कृति का दीदार कराती है, संकरी गलियों से होली की सुरीली धुन या चौराहों के होली मिलन समारोह बेजोड़ हैं।
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holi in varanasi
- फोटो : अमर उजाला
त्रलोक्य से न्यारी काशी नगरी की होली बाबा विश्वनाथ दरबार से शुरु होती है। रंगभरी एकादशी के दिन सभी लोग बाबा संग अबीर-गुलाल खेलते हैं। अगले दिन महाश्मशान पर चिता के भस्म से होली खेली जाती है। इसके साथ ही सभी होलियाना माहौल में रंग जाते हैं। होली का यह सिलसिला बुढ़वा मंगल तक चलता है।
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holi in varanasi
- फोटो : अमर उजाला
गंगा घाटों पर आपसी सौहार्द के बीच रंगों की खुमारी का दीदार करने देश-विदेश के सैलानी जुटते हैं। फाग के रंग और सुबह-ए-बनारस का प्रगाढ़ रिश्ता यहां की विविधताओं का अहसास कराता है। गुझिया, मालपुए, जलेबी और विविध मिठाइयों, नमकीनों की खुशबू के बीच रसभरी अक्खड़ मिजाजी और किसी को रंगे बिना नहीं छोड़ने वाली बनारस की होली नायाब है।
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rangbhari
- फोटो : अमर उजाला
इस दौरान जगह-जगह होली मिलन समारोहों की धूम देखने को मिलती है, जहां पर अबीर-गुलाल के बीच सभी एक-दूसरे से गले मिलते हैं। बनारस में सब कुछ बदलने के बाद भी लोग होली की मस्ती में डूबना नहीं भूलते। होली के दिन पूरे शहर की गलियों व नुक्कड़ों पर होलिका दहन के साथ ही युवकों की टोलियां फाग गाती हुई रात भर हुड़दंग करती है। कई स्थानों पर ढोल- नगाड़ों की थाप व भोजपुरी फिल्मी गीतों पर डांस होता है।
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rangbhari
- फोटो : अमर उजाला
दूसरे दिन पूरा शहर रंगोत्सव में डूब जाता है। शहर के कई क्षेत्रों से बैंड-बाजे के साथ निकलने वाली होली बारात में बाकायदा दूल्हा रथ पर सवार होता है। बारात जब अपने नीयत स्थल पर पहुंचती है तो महिलाएं परंपरागत ढंग से दूल्हे का स्वागत भी करती हैं। मंडप में दुल्हन भी आती है, लेकिन वर-वधू के बीच बहस शुरू होती है और दुल्हन शादी से इनकार कर देती है। बारात रात में लौट जाती है।
होली वाले दिन काशी में चौसट्टी देवी और अपने अराध्य काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ का दर्शन करना लोग नहीं भूलते। बनारस की होली में कभी अस्सी का चर्चित कवि सम्मेलन भी था। मशहूर हास्य कवि स्व. चकाचक बनारसी, पं. धर्मशील चतुर्वेदी, सांड़ बनारसी, बदरी विशाल आदि शरीक होते थे। चकाचक के निधन के बाद अस्सी के हास्य कवि सम्मेलन पर विराम लग गया। अब इसका स्थान टाउनहाल मैदान में होने वाले हास्य कवि सम्मेलन ने ले लिया है।