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Deoband: चंदे पर चलने वाला विश्व का पहला मदरसा है इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम

Sun, 26 Nov 2023 10:58 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सहारनपुर
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दारुल उलूम देवबंद - फोटो : डेमो

उत्तर प्रदेश के देवबंद स्थित इस्लामिक शिक्षण संस्था दारुल उलूम देश ही नहीं बल्कि दुनिया का पहला ऐसा मदरसा है, जिसका संचालन चंदा इकट्ठा करके किया जाता है। मौजूदा समय में इसका वार्षिक बजट 46 करोड़ रुपये से अधिक का है। स्थापना से पहले ही यह निर्णय लिया गया था की इसमें न तो किसी प्रकार की सरकारी मदद ली जाएगी और न ही यह किसी व्यक्ति विशेष के भरोसे चलेगा।

दरअसल, मुगल सल्तनत व अन्य मुस्लिम बादशाहों के दौर में मदरसों में होने वाले खर्चों की जिम्मेदारी बादशाहों की हुआ करती थी। मुगलिया सल्तनत का सूरज डूबने और हिंदुस्तान पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद बादशाही खर्चों पर चलने वाले मदरसे भी बंद हो गए।

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दारुल उलूम देवबंद

वर्ष 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों के असफल आंदोलन के बाद जब इस बात की शिद्दत से जरूरत महसूस हुई कि देश को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराने और इस्लाम व मुसलमानों की हिफाजत के लिए मदरसों की स्थापना बेहद जरूरी है।
 

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- फोटो : अमर उजाला

उस समय हाजी आबिद हुसैन, मौलाना कासिम नानौतवी, मौलाना फजलुर्रहमान उस्मानी देवबंदी, मौलाना जुल्फिकार अली देवबंदी, मौलाना याकूब नानौतवी व मौलाना शाह रफीउद्दीन देवबंदी ने यह फैसला लिया कि एक ऐसा मदरसा कायम किया जाए जिसका जिम्मेदार न तो कोई सरकारी विभाग हो और न ही कोई व्यक्ति विशेष। उसकी पूर्ण जिम्मेदारी कौम की होगी।

 

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दारुल उलूम में मदरसों का सम्मेलन - फोटो : अमर उजाला

दारुल उलूम के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने बताया की मौलाना कासिम नानौतवी ने मदरसे के लिए जो सिद्धांत बनाए, उनमें पहला सिद्धांत यही था कि मदरसा आम लोगों के चंदे पर चलेगा।

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दारुल उलूम देवबंद

30 मई 1866 को दारुल उलूम देवबंद की बुनियाद रखी गई। सबसे पहले चंदा इकट्ठा करने की जिम्मेदारी हाजी आबिद हुसैन को दी गई। जिन्होंने आम लोगों से घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा करना शुरू किया। वर्तमान में संस्था का बजट 46 करोड़ रुपये से अधिक है।  

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दारुल उलूम - फोटो : Amar Ujala

चंदा इकट्ठा करने के लिए 50 जोन में बांटा हुआ है हिंदुस्तानदारुल उलूम के तंजीम-ओ-तरक्की विभाग के अशरफ उस्मानी ने बताया कि हिंदुस्तान को 50 जोन में बांटा हुआ है। जिसमें उनके सफीर (चंदा इकट्ठा करने वाले) घर-घर जाकर छोटी-छोटी रकम चंदे के रूप में इकट्ठा करते हैं। जिनसे दारुल उलूम का पूरा खर्च चलता है।

अशरफ उस्मानी बताते हैं कि स्थापना के बाद से 40 साल तक दारुल उलूम का कोई निर्धारित बजट नहीं था और न ही इसमें कोई मेस (रसोईघर) हुआ करता था। देवबंद के बाशिंदों ने ही इतने वर्षों तक अपने घरों से खाना लाकर छात्रों को खिलाया।

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देवबंद - फोटो : अमर उजाला

संस्था में पढ़ते हैं साढ़े चार हजार से अधिक छात्र 
एक छात्र से आरंभ हुए दारुल उलूम में वर्तमान में छात्रों की संख्या साढ़े चार हजार से अधिक है। इसमें देश के कोने-कोने से छात्र आकर तालीम हासिल कर रहे हैं। उनसे कोई फीस भी नहीं ली जाती। यहां तक कि तालीम लेने वाले बच्चों को छात्रवृत्ति भी दी जाती है। वर्तमान में छात्रवृत्ति पाने वाले छात्रों की संख्या करीब ढाई हजार के आसपास है।

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