हाथ नहीं हैं, बहादुर बेटी मंजू पैरों से सपने बुन रही है। आठ साल पहले एक हादसे ने मंजू के हाथ छीन लिए थे। संभल के एमजीएम कॉलेज से बीए दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं मंजू की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है।
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संभल की मंजू बनी दूसरों के लिए मिसाल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
संभल शहर से करीब पांच किलोमीटर दूरी पर बसे गांव चिमियावली की बहादुर बेटी मंजू को आत्मनिर्भर बनने की ललक ने इतना आगे बढ़ा दिया है कि वह अब मुड़कर पीछे देखना ही नहीं चाहती। वह अपने भविष्य को संवारना चाहती है। उसके हाथ नहीं हैं और वह पैरों से अपने सपने बुन रही है। पैरों से कंप्यूटर चला लेती है। कपड़े प्रेस करती है। कपड़े भी सिलती है। उसका कहना है कि उसने कड़े संघर्ष के बाद खुद को अब तैयार कर लिया है। वह बीए कर रही है और पैरों से ही लिखती है।
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मशीन में धागा लगाती मंजू
- फोटो : संवाद
संभल के एमजीएम कॉलेज से बीए दूसरे सेमेस्टर की पढ़ाई कर रहीं मंजू की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। लेकिन उसकी कहानी हकीकत है। ऐसी हकीकत जिसमें दर्द की तस्वीर आज भी मंजू के साथ उनकी मां सोमवती के चेहरे से साफ छलकती है।
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पांव से प्रेस करती हुई
- फोटो : संवाद
सोमवती का गला बेटी का संघर्ष बताते-बताते भर आया। मंजू के पिता कल्लू ने बेटी के हौसले को हमेशा उड़ान देने का काम किया है। वह हादसे के बाद से ही बेटी को पढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे और अब वह कहते हैं कि जितना पढ़ना है पढ़ लो बेटा। मंजू की पढ़ाई में कोई दिक्कत न आए। इसका ख्याल मां, पिता के साथ बड़ा भाई अर्जुन और छोटा भाई कपिल भी रखता है।
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पांव से कैंची चलाकर कपड़े को काटती छात्रा
- फोटो : संवाद
मंजू अपने तीन भाई और तीन बहनों में तीसरे नंबर की हैं। सबसे बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और अब परिवार में तीन भाई और दो बहन हैं। खेती की जमीन तो कम है इसलिए मंजू के पिता और भाई मेहनत मजदूरी कर परिवार की गुजर-बसर करते हैं।
बहुत रोती थी और भगवान से शिकायत करती थी, तब दादा बढ़ाते थे मेरा हौसला
मंजू ने बताया कि करीब आठ वर्ष पहले हादसे में हाथ गए तो लगा अब पढ़ना तो दूर की बात है जीना भी मुश्किल हो जाएगा। वह बहुत रोती और भगवान से शिकायत करती थीं। मंजू के दादा रामचंद्र कहते थे कि बेटा पढ़ने के लिए हिम्मत चाहिए और इस हिम्मत को कम मत होने दो। यही उसकी प्रेरणा बन गई।
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घर में सफाई करती मंजू
- फोटो : संवाद
इसके बाद मंजू ने पढ़ने का संकल्प लिया और शिद्दत से मेहनत की तो 2023 में पहली बार में ही हाईस्कूल की परीक्षा 59 प्रतिशत और 2025 में इंटर की परीक्षा 55 प्रतिशत अंक के साथ पास की। अब बीए कर रही हैं। दूसरे सेमेस्टर की परीक्षाएं चल रही हैं।
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मंजू के परिजन
- फोटो : संवाद
कॉलेज में नहीं मिला प्रवेश तो निराश हो गई थी मंजू
मंजू को अपनी दिव्यांगता के चलते दो बार निराश भी होना पड़ा। जब वह नवीं कक्षा में प्रवेश के लिए संभल के राजकीय कन्या इंटर कॉलेज गई तो दिव्यांगता देखते हुए प्रवेश नहीं दिया गया। उसके बाद 11वीं में प्रवेश के लिए गई तब भी प्रवेश नहीं दिया गया। मंजू का कहना है कि दोनों ही बार उसको काफी निराशा हुई थी। लेकिन दोस्त नेहा, रूबीना और सावित्री ने हौसला कम नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि वह सभी सिरसी के जवाहर लाल इंटर कॉलेज में प्रवेश लेंगी।
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मंजू बनी मिसाल
- फोटो : संवाद
मां ने कहा- मेरी बेटी बहुत मेहनती है
मंजू कपड़े धोने के साथ पैरों से ही झाडू तक लगा लेती हैं। घर में ऐसा कोई काम नहीं जो वह कर नहीं पातीं। मां ने कहा, कि उनकी बेटी बहुत मेहनती है। पढ़ने में भी मेहनत करती है और घर के काम में भी पूरा सहयोग रहता है। कभी वह यह महसूस होने नहीं देती कि वह दिव्यांग हो चुकी है।
लड़कियों के सामने आम तौर पर काफी दिक्कत आती रहती हैं। मैं तो हादसे से दिव्यांग हो गई। मेरे अंदर जो आत्मनिर्भर बनने की ललक थी उससे आगे बढ़ पाई। मुझे अतीत पर अफसोस होता है लेकिन अब मुझे भविष्य के लिए लगातार संघर्ष करना है। फिलहाल तो पढ़ने पर फोकस है लेकिन नौकरी की इच्छा रेलवे में रहती है। अभी पढ़ाई पूरी हो जाए। हमारा संघर्ष तो जारी रहेगा।- मंजू