प्रियम गर्ग
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क्रिकेट में मेरठ का यह उभार अनायास नहीं है। कोहरे से ढकी, ठंड से जकड़ी किसी भी सुबह विक्टोरिया पार्क, करन पब्लिक स्कूल, कैलाश प्रकाश स्टेडियम पहुंच जाइये। नेट पर पसीना बहा रहे लड़कों की लगन देखकर ऐसा लगेगा कि वह मौजूदा टीम इंडिया से किसी को बेदखल करके ही मानेंगे। मेरठ के इन खेल मैदानों की किस्मत भले ही मुंबई के शिवाजी पार्क जैसी न हो। जहां पवेलियन में बैठे सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, दिलीप बेंगसरकर जैसे महान खिलाड़ी किसी की कवर ड्राइव, रिवर्स शॉट, हुक और पुल देखकर रीझ जाएं। पैड, ग्ल्ब्स, बैट बख्शीश में दे दें।
भले ही अतहर अली, संजय रस्तोगी और विपिन वत्स की किस्मत और शोहरत रमाकांत आचरेकर जैसी नहीं है। पर मेरठ के खिलाड़ी अगर मुकाम पर पहुंचे हैं तो इन्हीं गुरुओं की खून-पसीने की मेहनत है। जिन्होंने गली क्रिकेट में टेनिस बॉल से शुरुआत करने वाले लड़कों को तराशकर स्विंग का सुल्तान बना दिया। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों में ऐसा आत्मविश्वास भरा कि वह अपने बच्चे को अभिजात्य वर्ग का खेल माने जाने वाले क्रिकेट का गुर सिखाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दे रहा है। भले ही उसे साइकिल पर दूध क्यों न बेचना पड़े।