सहारनपुर में अधिकारियों और पुलिस के समय से एक्शन में आने और अमनपसंद लोगों के प्रयास की वजह से दंगा टल गया। जुलूस के दौरान उग्र हुई भीड़ के आगे हिंदू समाज के दुकानदारों ने धैर्य का परिचय दिया।
सहारनपुर में जुमे की नमाज के बाद सड़कों पर उतरे मुस्लिम समुदाय के लोगों में शामिल कुछ खुराफाती युवकों ने शहर को दंगे की आग में झोंकने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के ही अमनपसंद लोगों के प्रयास तथा प्रशासन व पुलिस अधिकारियों द्वारा सही समय पर सही एक्शन लेने की वजह से बच गया। उधर, हिंदू समुदाय के दुकानदारों ने भी धैर्य का परिचय दिया।
शुक्रवार की दोपहर हजारों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग घंटाघर पर जमा थे, जिनमें ज्यादातर 18 से 25 वर्ष की आयु के युवा नजर आ रहे थे। प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें काफी समझाया। इसके बाद मंडलायुक्त लोकेश एम और आईजी डॉ. प्रीतिंदर सिंह, सिटी मजिस्ट्रेट विवेक चतुर्वेदी, सिटी मजिस्ट्रेट राजेश कुमार सहित तमाम अधिकारी भीड़ को समझाकर नेहरू मार्केट के रास्ते शहीद गंज की ओर ले जा रहे थे। इसी दौरान भीड़ उग्र हो गई।
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सहारनपुर हिंसा
- फोटो : amar ujala
श्रीराम तिराहे तक ले जाने में प्रशासन और पुलिस बल को करीब 25 मिनट का समय लग गया, क्योंकि विरोध प्रदर्शन करने वाले लोग जाने को तैयार नहीं थे। जैसे ही भीड़ श्रीराम तिराहे पर पहुंची तो यहां खुली कुछ दुकानों में घुसकर कुछ युवकों ने सामान लूटने का प्रयास किया। कुछ दुकानदारों का सामान उठाकर दुकानों से बाहर फेंक दिया गया। दुकानों के बाहर खड़े दुपहिया वाहनों को गिरा दिया गया।
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सहारनपुर हिंसा
- फोटो : amar ujala
भीड़ के साथ चल रहे मुस्लिम समुदाय के ही अमन पसंद लोगों ने भी उत्पात मचा रहे युवकों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन वह सुनने को तैयार नहीं थे। ऐसे में पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। गनीमत रही कि दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने नहीं आए। जिससे 2014 की तरह विरोध उपद्रव में नहीं बदला।
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सहारनपुर हिंसा
- फोटो : अमर उजाला
गौरतलब है कि गुरुद्वारा रोड पर एक भूखंड को लेकर दो समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए थे। जिसके बाद अंबाला रोड की दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया था। दंगा भड़कने के बाद जिले भर में रिएक्शन के तौर पर आगजनी और मारपीट हुई थी, जिसके बाद प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा था। तब भी उपद्रव करने वाले चुनिंदा ही लोग थे, लेकिन झेलना सभी समुदाय के लोगों को पड़ा था। शुक्रवार को मामला शांत होने के बाद आईजी डॉ. प्रीतिंदर सिंह ने अपने बयान में यह बात स्वीकार की है कि दुकानों में लूट का प्रयास हुआ है।
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सहारनपुर हिंसा
- फोटो : amar ujala
अमन पसंद लोगों का शहर है सहारनपुर
सहारनपुर में बाबा लाल दास और हाजी शाह कमाल की दोस्ती की मिसाल दी जाती है, लेकिन सहारनपुर 2014 के बाद आठ साल बाद फिर दंगे की आग में झोंका जा रहा था। सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक सहारनपुर को पहली नजर 1982 में लगी। मंडी थानांतर्गत चिलकाना रोड मंदिर और मस्जिद मिली हुई है।
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जुमे की नमाज के बाद बवाल।
- फोटो : अमर उजाला
2014 में दीवार के निर्माण को लेकर शहर में भारी बवाल हुआ था। कई लोगों की मौत भी हुई थी। इसके बाद वर्ष 1991 में रामनवमी के जुलूस के दौरान शहर को दंगे की मार झेलनी पड़ी। रमजान चल रहे थे। तब धार्मिक स्थल के समीप बैंड बजाने को लेकर ऐसा विवाद हुआ, जिसने पल भर में ही दंगे का रूप ले लिया।
उस दौरान भी चाकूबाजी और गोलीबारी में कई लोगों की जान गई थी। इसके अगले ही साल 1992 में अयोध्या विवाद को लेकर देश में फैली आग से सहारनपुर भी नहीं बच सका था। तब भी शहर में दुकानों में लूटपाट, आगजनी हुई थी और शहर के लोगों को फिर कर्फ्यू में रहना पड़ा।