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आरवीसी सेंटर: यहां तैयार होते हैं सेना के जांबाज साइलेंट वॉरियर, एशियन खेलों में रचा था इतिहास

Fri, 14 Dec 2018 12:23 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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डॉग स्क्वॉयड दिल्ली पुलिस - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली
जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से मुठभेड़ हो या फिर सरहद पर रखवाली का जिम्मा। मेरठ के आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज में तैयार किए गए साइलेंट वारियर्स श्वान देश में अहम भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय सेना का महत्वपूर्ण अंग बने 1000 से भी ज्यादा इन मूक योद्धाओं का वर्षों से अहम योगदान रहा है। आरवीसी के प्रशिक्षित श्वान ही नहीं बल्कि यहां के अश्वों की भी दुनिया भर में मांग है। यहां के घुड़सवारों ने हाल ही में एशियन खेलों में दो सिल्वर मेडल जीतकर देश में एक और इतिहास रच दिया है।
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डॉग स्क्वॉयड दिल्ली पुलिस - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली
भारतीय सेना की आन-बान-शान में चार चांद लगाने वाला आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज 14 दिसंबर को अपना 240वां कोर डे मनाने जा रहा है। सेना में सिर्फ जवान ही नहीं लड़ते बल्कि यहां पर एक और नाम ऐसा है जो दुश्मनों के दांत खट्टे कर देता है। सेना में इन्हें साइलेंट वारियर्स कहा जाता है। यानी मूक योद्धा।
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हत्या के बाद जांच में डाग स्कवायड। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
जी हां, आर्मी श्वान के बारे में जितनी तारीफ की जाए उतना कम है। एक सैनिक की तरह इन श्वान की भी स्पेशल ट्रेनिंग बेहद सख्त मानी जाती है। मेरठ के आरवीसी ट्रेनिंग स्कूल में प्रशिक्षित किए गए साइलेंट वारियर्स पैंतीस फीट बर्फ में दबे हुए सेना के जवानों को खोजने की क्षमता रखते हैं। जमीन के भीतर कई फीट नीचे बिछे हुए एक्सप्लोसिव डिवाइस को ये चंद सेकेंडों में सूंघ लेते हैं।

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डॉग स्कवाड - फोटो : SELF
देश की सुरक्षा में इनकी इतनी अहम भूमिका हो गई है कि पिछले कई वर्षों में यहां के तैयार किए श्वान ने कितने ही आतंकियों को पकड़ने में अहम भूमिका निभाई है। यहां एक आर्मी श्वान को तैयार करने में वर्षों लग जाते हैं। चीते जैसी फुर्ती रखने वाले इन श्वान की संख्या इस वक्त देश में करीब 1000 से ज्यादा है। इनकी संख्या को बरकरार रखने का जिम्मा आरवीसी सेंटर पर है।
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डॉग स्क्वॉयड दिल्ली पुलिस - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली
इनके करतब देखकर ही इनकी ताकत और सोचने की शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कई मित्र देशों को भी यहां के प्रशिक्षित श्वान दिए गए हैं। आरवीसी ने सिर्फ सेना को ही नहीं बल्कि पैरामिलिट्री फोर्स और पुलिस को भी उच्च नस्ल के प्रशिक्षित श्वान और अश्व दिए हैं। आजकल सरहद पर इनका इस्तेमाल दिन-रात काउंटर इमरजेंसी और घुसपैठ रोकने के लिए किया जा रहा है।
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डॉग स्क्वॉयड दिल्ली पुलिस - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली
देशी नस्ल को भी किया प्रशिक्षित 
मेरठ छावनी में स्थित रिमाउंट वेटनरी कॉर्प्स में जहां पहले जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर जैसी नस्लों को ट्रेंड किया जाता था। वहीं, अब भारतीय नस्ल के देशी कुत्तों मुधोल को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। छह महीने से नौ महीने की उम्र के श्वान को कठोर ट्रेनिंग दी जाती है। इन श्वान की दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू हो जाती है। जिसमें ग्रूमिंग, व्यायाम, खाना-पीना और एक गहन प्रशिक्षण शामिल होता है।
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horse riding in moradabad - फोटो : अमर उजाला
उन्हें संदिग्ध चीजों की पहचान कराने के लिए टॉय-गन, टॉय-रोबोट, बॉल्स व डॉल्स आदि का इस्तेमाल किया जाता है। यही नहीं उनके ट्रेनिंग सेंटर में स्पेशल थिएटर भी होता है। यहां उन्हें चीजों को समझाने के लिए कार्टून फिल्में भी दिखाई जाती हैं। स्पेशल ट्रेनिंग के बाद उनका पूरा टेस्ट होता है। जो इस टेस्ट में फेल हो जाते हैं, उनको फिर से कठोर मेहनत करनी होती है।

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फ्रांस के घोड़े कैनीजेडी के साथ सवार राकेश - फोटो : अमर उजाला
कई महत्वपूर्ण ऑपरेशन और युद्धों में लिया भाग
कॉमनवेल्थ गेम्स में यहां के प्रशिक्षित श्वान ने सक्रिय भूमिका निभाई। लद्दाख में बादल फटने पर आरवीसी के श्वानों ने 35 लोगों को सुरक्षित निकालने में मदद की थी। सेना के पशुओं की चिकित्सा व बीमारी के क्षेत्र में भी आरवीसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कई दूसरे देशों में भी यहां की टीम काम कर रही है।

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डॉग स्क्वॉयड दिल्ली पुलिस - फोटो : विवेक निगम/अमर उजाला, नई दिल्ली
सेना को सशक्त करने की दिशा में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर मेरठ में कोठावाला पोलो ग्राउंड पर 21 दिसंबर 1989 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रजेंटेशन ऑफ द कलर से सम्मानित किया था। इसके अलावा यहां के श्वान को जीओसी इन सी कमेंडेशन कार्ड 158, चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन 48, वाइस चीफ कमेंडेशन कार्ड 01 और बेस्ट आर्मी एनीमल अवार्ड  01 मिल चुका है।

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आरवीसी सेंटर लौटते वक्त कुछ इस तरह हुआ घुड़सवारों का स्वागत - फोटो : अमर उजाला
घुड़सवारी में रचा इतिहास
आरवीसी के जांबाज घुड़सवारों ने 36 साल बाद घुड़सवारी में जकार्ता में हुए एशियन खेलों में सिल्वर मेडल दिलाकर नाम रोशन कर दिया है। आरवीसी सेंटर के जितेंद्र सिंह, राकेश कुमार और एएससी के मेजर आशीष मलिक की बदौलत ये सफलता प्राप्त है। अब ये जांबाज ओलंपिक की तैयारी में जुटे हैं। इसके अलावा हर साल आरवीसी में प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। यहां तैयार उच्च नस्ल के अश्वों की मांग दुनिया भर में है।
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खोजी कुत्तों की रखी जाती है खास देखभाल - फोटो : Getty
गौरवमयी इतिहास
आरवीसी का अस्तित्व सन 1779 से है। ब्रिटिश सेना में पहले अश्वों का विभाग कोलकाता में गठित हुआ था। आर्मी रिमाउंट डिपार्टमेंट का गठन सन 1875 में सहारनपुर में किया गया। 14 दिसंबर 1920 को आर्मी वेटनरी कोर बनाई गई। साल 1950 में रिमाउंट वेटनरी और फार्म कोर गठित हुई। मई 1960 में आरवीसी और मिलिट्री फार्म को अलग कर दिया गया।

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