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तस्वीरें: आरवीसी में मनाया 240वां स्थापना दिवस, गूंजे देशभक्ति के तराने, वेटरंस ने साझा की यादें  

Sat, 15 Dec 2018 10:57 AM IST
दुष्यंत शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ में आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज का शुक्रवार को 240वां स्थापना दिवस मनाया गया। नन्हे-मुन्ने बच्चों की देशभक्ति गीतों पर प्रस्तुति ने सबका मन मोह लिया। आर्मी बैंड की स्वर लहरियों ने पूरे माहौल को देशभक्ति से ओतप्रोत कर दिया। स्थापना दिवस पर बड़ेखाने में जवानों-अफसरों और वेटरंस ने एक साथ बैठकर भोजन किया, पुरानी यादें ताजा कीं। आरवीसी के डीजी लेफ्टिनेंट जनरल वेंकटेश और कमांडेंट अनिल कुमार ने परिचय लिया। इस दौरान आरवीसी के इतिहास से लेकर जकार्ता में मैडल जीतने वाले घुड़सवारों की जाबांजी के बारे में बताया गया। बच्चों-बड़ों ने सेल्फी लेकर कार्यक्रम का लुत्फ उठाया।

 
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कोलकाता में गठित हुआ था विभाग

आरवीसी का अस्तित्व सन 1779 से है। ब्रिटिश सेना में पहले अश्वों का विभाग कोलकाता में गठित हुआ था। आर्मी रिमाउंट डिपार्टमेंट का गठन सन 1875 में सहारनपुर में किया गया। 14 दिसंबर 1920 को आर्मी वेटनरी कोर बनाई गई। साल 1950 में रिमाउंट वेटनरी और फार्म कोर गठित हुई। मई 1960 में आरवीसी और मिलिट्री फार्म को अलग कर दिया गया।

 
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शुक्रवार को भारतीय सेना की आन-बान-शान में चार चांद लगाने वाले आरवीसी सेंटर एंड कॉलेज ने अपना 240वां कोर डे मनाया। इन सालों में आरवीसी ने सेना, पैरामिलिट्री फोर्स और पुलिस को भी उच्च नस्ल के प्रशिक्षित श्वान और अश्व दिए हैं। यहां के प्रशिक्षित श्वान की देश में इतनी अहम भूमिका हो गई है कि पिछले कई सालों में इसने कितने ही आतंकियों को पकड़ने में अहम भूमिका निभाई। 

 

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कठोर ट्रेनिंग दी जाती है

चीते जैसी फुर्ती रखने वाले इन श्वानों की संख्या इस वक्त देश में करीब 1000 से ज्यादा है। इनकी संख्या को बरकरार रखने का जिम्मा आरवीसी सेंटर पर है। इनके करतब देखकर ही इनकी ताकत और सोचने की शक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। कई मित्र देशों को भी यहां के प्रशिक्षित श्वान दिए गए हैं। आजकल सरहद पर इनका इस्तेमाल दिन-रात काउंटर इमरजेंसी और घुसपैठ रोकने के लिए किया जा रहा है।

 
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कॉर्प्स में जहां पहले जर्मन शेफर्ड, लेब्राडोर जैसी नस्लों को ट्रेंड किया जाता था। वहीं, अब भारतीय नस्ल के देसी कुत्तों मुधोल को भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। छह महीने से नौ महीने की उम्र के श्वान को कठोर ट्रेनिंग दी जाती है। इन श्वान की दिनचर्या सुबह चार बजे से शुरू हो जाती है जिसमें ग्रूमिंग, व्यायाम, खाना-पीना और एक गहन प्रशिक्षण शामिल होता है। स्पेशल ट्रेनिंग के बाद उनका पूरा टेस्ट होता है। जो इस टेस्ट में फेल हो जाते हैं, उनको फिर से कठोर मेहनत करनी होती है।
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कई महत्वपूर्ण ऑपरेशन और युद्धों में लिया भाग

कॉमनवेल्थ गेम्स में यहां के प्रशिक्षित श्वान ने सक्रिय भूमिका निभाई। लद्दाख में बादल फटने पर आरवीसी के श्वान ने 35 लोगों को सुरक्षित निकालने में मदद की थी। सेना के पशुओं की चिकित्सा व बीमारी के क्षेत्र में भी आरवीसी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

 
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सेना को सशक्त करने की दिशा में लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर मेरठ में कोठावाला पोलो ग्राउंड पर 21 दिसंबर 1989 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने प्रजेंटेशन ऑफ द कलर से सम्मानित किया था। इसके अलावा यहां के श्वान को जीओसी इन सी कमेंडेशन कार्ड 158, चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ कमेंडेशन 48, वाइस चीफ कमेंडेशन कार्ड 01 और बेस्ट आर्मी एनिमल अवार्ड  01 मिल चुका है।

 
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मेरठ न्यूज - फोटो : अमर उजाला
घुड़सवारी में रचा इतिहास

आरवीसी के जांबाज घुड़सवारों ने 36 साल बाद घुड़सवारी में जर्काता में हुए एशियन खेलों में सिल्वर मेडल दिलाकर नाम रोशन किया था। आरवीसी सेंटर के जितेंद्र सिंह, राकेश कुमार और एएससी के मेजर आशीष मलिक की इस सफलता पर शुक्रवार को सभी को उनके बारे में बताया गया। अफसरों ने भी घुड़सवारों की सफलता पर एक दूसरे को बधाई दी। 
 
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