मेरठ के बसा टीकरी गांव के शहीद अजय कुमार के घर में शोक पसरा है। मिलने-जुलने वालों का तांता लगा है। दुख की घड़ी इतनी बड़ी है कि उसे बयां नहीं किया जा सकता। अजय की शहादत के साथ मेरठ के कुछ उन परिवारों का भी दर्द ताजा हो गया, जब उनके परिवार का कोई सदस्य सीमा से तिरंगे में लिपटा आया था...सालों पुराना वो खौफनाक दिन आज भी उन्हें सालता है। देश पर कुर्बान होने वाले इन शहीदों की वीर नारियों-बेटियों की अजय के परिवार के प्रति बेहद संवेदना है। देखें कैसे इन वीरांगनाओं ने पति की शहादत के बाद खुद को संभाला: -
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शहीद अजय कुमार
- फोटो : अमर उजाला
अपने पति को देश पर कुर्बान कर देने वाली इन वीर नारियों का कहना है कि इस दुख को कोई बांट नहीं सकता। न ही अपनों को भुलाया जा सकता है। इस दुख से निकलना ही सबसे बड़ा संघर्ष है। ये वीर नारियां प्रियंका से मिलकर उनको बताएंगी कि तमाम दुश्वारियों के बावजूद जिस तरह उन्होंने अपने बच्चों को योग्य बनाया। उसी तरह वह भी आगे बढ़ें और बेटे को कामयाबी की राह पर ले जाएं।
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सन् 1999 के कारगिल युद्ध में जब लांस नायक सत्यपाल सिंह ने अपनी शहादत दी थी तो उनकी उम्र महज 28 साल थी। वीर नारी बबीता देवी बताती हैं कि कई महीनों तक तो समझ में ही नहीं आया कि जिंदगी अब कैसे जिऊंगी। लेकिन बच्चों के भविष्य के खातिर हिम्मत जुटाई। दिक्कतें बहुर्त आईं, लेकिन हार नहीं मानी। अब बेटे पुलकित एमबीए कर रहे हैं और बिटिया दिव्या एमए।
दोनों सेना में अफसर बनने के लिए तैयारी कर रहे हैं। दोनों को अपने पिता पर फख्र है। बबीता कहती हैं कि जिस दिन अजय के शहीद होने की खबर सुनी तो मुझे वो दिन याद आ गया, जब वो तिरंगे में लिपटकर आए थे। मेरी बेटी दिव्या भी उस वक्त ढाई साल की थी। बेटा पुलकित साढ़े तीन साल का। बबीता कहती हैं कि वे प्रियंका से मिलने उसके घर जाएंगी। बताएंगी कि हिम्मत रखो। अपने बच्चे के लिए जीओ। उसे कामयाब बनाओ।
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वीर नारी उर्मिला देवी - बच्चों के लिए खुद को मजबूत बनाया
1999 के कारगिल युद्ध में शहीद हुए थे हस्तिनापुर के ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव। उनकी पत्नी वीर नारी उर्मिला देवी बताती हैं कि जब वे शहीद हुए तो बड़ी बेटी ज्योति आठ, बेटा संदीप सात और दीपक चार साल का था। उनके जाने के बाद परिवार की मदद से खुद को मजबूत बनाया। बच्चों के भविष्य की खातिर मजबूती से खड़ी हुई। फिलहाल बेटी की शादी हो चुकी है।
बड़ा बेटा गैस एजेंसी देखता है और छोटा एमएससी कर रहा है। उर्मिला कहती हैं कि सीआरपीएफ जवानों पर हमले से बहुत आहत थी। तभी ये मनहूस खबर भी सुनने को मिली कि यहां के अजय कुमार शहीद हो गए हैं। उर्मिला कहती हैं कि आसान नहीं है इतनी जल्दी खुद को संभालना, लेकिन प्रियंका को अपने सास-ससुर और बच्चे के लिए हौसला दिखाना होगा। मैं परिवार समेत इस वीर परिवार से मिलने गांव जाऊंगी।
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वीर बेटी आरती - ऐसे वीरों के लिए आगे आए समाज
साल 2006 में जम्मू के अनंतनाग में आतंकियों से मुकाबला करते हुए कंकरखेड़ा के देशपाल सिंह शहीद हुए थे। देशपाल सिंह की वीर बेटी आरती उस समय महज छह साल की थी। उनको बस कुछ ही बातें याद हैं। आरती ने बताया कि परिवार में मम्मी बबीता तोमर के अलावा कोई और बड़ा नहीं था। पापा के जाने के बाद मम्मी ने बहुत सी मुश्किलों का सामना किया। वह जब नौ साल की थी। उनकी मां की हत्या कर दी गई।
उसके बाद परिवार में कोई नहीं रहा। आरती बताती हैं कि उनके मामा वीरसैन और मामी शिमला ने उनको बेटी की तरह पाला। पूर्व सैनिक संगठन के अध्यक्ष मेजर राजपाल ने बहुत मदद की। इन लाेगों की बदौलत मैं अपना ग्रेजुएशन पूरा कर चुकी हूं। फिलहाल एयरफोर्स में भर्ती होने के लिए तैयारी कर रही हूं। आरती ने बताया कि अजय के बारे में सुनकर बहुत दुख हुआ। उनके जाने के बाद प्रियंका के लिए एक नई जंग शुरू हो गई है। इस जंग को उसे अपने हौसले से जीतना होगा। ऐसे में सबको साथ खड़े होना होगा। सेना के अलावा सरकार और समाज भी ऐसे वीरों के लिए आगे आए।
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वीर नारी इमराना -तमाम दुश्वारियां आईं, लेकिन आगे बढ़ती रही
कारगिल युद्ध में 22 ग्रेनेडियर के सिपाही जुबैर अहमद भी शहीद हुए थे। लिसाड़ी गेट निवासी जुबैर अहमद की वीर नारी इमराना बताती हैं कि निकाह को छह साल हुए थे। बेटा खालिद छह माह का था। बड़ी बेटी सना साढ़े चार साल और छोटी ढाई साल की थी। शुरू में तो समझ हीं नहीं आया कि अब क्या होगा। फिर सोचा कि मैं ही ऐसे सोचूंगी तो मेरे बच्चों का क्या होगा।
जिंदगी में तमाम दुश्वारियां आईं, लेकिन आगे बढ़ती रही। इस गम का बोझ सहना कितना मुश्किल होता है, ये बस वही जानती हैं। बताती हैं कि बीबीए कर रही छोटी बेटी निशा की इच्छा सेना में अफसर बनने की है। बड़ी बेटी सना पीएचडी करके प्रोफेसर बनना चाहती हे। बेटा पढ़ रहा है। इमराना बताती कि जब से अखबार में अजय के शहीद होने की खबर आई है तब से उसके घर जाने की इच्छा है। मैं प्रियंका से मिलूंगी। उसको बताऊंगी कि अपने बच्चे के लिए, सास-ससुर के लिए हिम्मत जुटाए।
वीर नारी मुनेश देवी -शहादत के वक्त वादे करे सरकार तो पूरे करे
कारगिल युद्ध के एक और शहीद थे कंकरखेड़ा निवासी हवलदार यशवीर सिंह। 1999 में जब तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर आया तो पत्नी मुनेश देवी बेहोश हो गईं। वीर नारी मुनेश देवी बताती हैं कि उस वक्त बड़ा बेटा 12 और छोटा नौ साल का था। एक साल तक हालत बहुत खराब रही। घर से बाहर का कुछ पता नहीं था। इस कारण बहुत समस्याएं आईं। फिर सोचा कि बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा।
मुनेश बताती हैं कि सेना ने मदद की, लेकिन सरकार ने कई वादे पूरे नहीं किए। जिस दिन अजय के शहीद होने का पता चला, फिर से वह मनहूस दिन याद आ गया। मुनेश देवी कहती हैं कि जो वादे शहीद परिवारों से किए जाते हैं उनको सरकार जरूर पूरा करे। जहां तक बच्चों के भविष्य का सवाल है तो इसके लिए ऐसे परिवारों को खुद संघर्ष करना पड़ता है। प्रियंका से मिलकर उसको हिम्मत बंधाएंगी।