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डोज जिंदगी की : 16 करोड़ के इंजेक्शन से 21 महीने की इशानी को मिली नई जिंदगी, हर रोज मौत से लड़ रही थी लाड़ली

Sun, 20 Jun 2021 11:43 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ

सार

स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (एसएमए) बीमारी हो तो शरीर में प्रोटीन बनाने वाला जीन नहीं होता। इससे मांसपेशियां और तंत्रिकाएं (Nerves) खत्म होने लगती हैं।
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माता-पिता के साथ इशानी - फोटो : amar ujala
मेरठ के ब्रह्मपुरी की 21 माह की इशानी को 16 करोड़ का इंजेक्शन लग गया है। अभी तीन से छह माह तक वह डॉक्टरों की निगरानी में रहेगी। लगातार उसके रक्त की जांचे होंगी। वह 'स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी टाइप टू' नाम की खतरनाक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित है। वह हर रोज मौत से लड़ रही थी। 

इशानी को बचाने के लिए उसे जोलजेनस्मा इंजेक्शन देना था, जो 16 करोड़ रुपये का है। निजी कंपनी में जॉब करने वाले उसके पिता अभिषेक वर्मा ने बताया कि 16 करोड़ का इंजेक्शन जुटाना आसान नहीं था,  काफी कोशिश की, मगर नाकाम रहे।
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स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी बीमारी से पीड़ित इशानी - फोटो : amar ujala
इशानी के पास तीन माह से भी कम समय बचा था। यह इंजेक्शन बनाने वाली कंपनी दुनिया के 100 बच्चों को हर साल 16 करोड़ का इंजेक्शन निशुल्क मुहैया कराती है। उन बच्चों में इशानी को चुन लिया गया। 

 
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स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी बीमारी से पीड़ित इशानी - फोटो : amar ujala
इशानी की मां नीलम वर्मा ने बताया कि 17 जून को इशानी को दिल्ली एम्स में इंजेक्शन दिया गया। नीलम इशानी की मदद करने के लिए नोवार्टिस कंपनी का धन्यवाद कहती हैं। 
 

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स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी बीमारी से पीड़ित इशानी - फोटो : amar ujala
क्या है एसएमए बीमारी
स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी (एसएमए) बीमारी हो तो शरीर में प्रोटीन बनाने वाला जीन नहीं होता। इससे मांसपेशियां और तंत्रिकाएं (Nerves) खत्म होने लगती हैं। दिमाग की मांसपेशियों की एक्टिविटी भी कम होने लगती है। चूंकि मस्तिष्क से सभी मांसपेशियां संचालित होती हैं, इसलिए सांस लेने और भोजन चबाने तक में दिक्कत होने लगती है। 
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स्पाइनल मस्क्यूलर अट्रॉफी बीमारी से पीड़ित इशानी - फोटो : amar ujala
इसलिए महंगा है इंजेक्शन 
इंजेक्शन को स्विटजरलैंड की कम्पनी नोवार्टिस तैयार करती है। कंपनी का दावा है कि यह इंजेक्शन एक तरह का जीन थैरेपी ट्रीटमेंट है। जिसे एक बार लगाया जाता है। इसे स्पाइनल मस्क्यूलर अअट्रॉफी से जूझने वाले दो साल से कम उम्र के बच्चों को लगाया जाता है।
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