कुरु राज्य के कोषागार रहे बहसूमा की जमीन पर कुछ भग्नावशेष खड़े सिसक रहे हैं। महाभारत काल का यह महत्वपूर्ण स्थल राजा नैन सिंह की जन्म स्थली और मुख्यालय भी रह चुका है। राजा के महल और किले का नामोंनिशां मिट गया। जैन तीर्थंकर चंद्र प्रभु की प्रतिमा (चतुर्थ काल) इस क्षेत्र की अनन्य निधि है। बहसूमा में राजा नैन सिंह की विरासत के रूप में शिव मंदिर देखा जा सकता है -
मेरठ-बिजनौर मार्ग पर स्थित बहसूमा में कुछ पुरानी इमारतों ने नया लिबास पहन लिया। पुराने के नाम पर लोग दीवानखाना दिखा देते हैं। नैन सिंह के पुत्र नत्था सिंह की बेटी लाड़कौर के महल को भी आधुनिक रूप दिया जा चुका है। संरक्षण के अभाव में ऐतिहासिक इमारतों से उनका स्वरूप छीन लिया गया। कुछ को जमींदोज कर दिया गया।
दिगंबर जैन मंदिर में आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु की खड्गासन में प्रतिमा दर्शनीय है। यह चतुर्थ काल की कही जाती है। पुजारी शशिबाला भी इसकी पुष्टि करती हैं। मंदिर करीब 250 साल पुराना है। इससे आगे चलकर शिव मंदिर है। राजा नैन सिंह ने इसकी स्थापना की थी। यह मंदिर करीब 250 साल पुराना है।
इतिहास में बहसूमा
‘मेरठ के पांच हजार वर्ष’ पुस्तक के अनुसार मवाना के निकट बहसूमा के संबंध में यह प्रचलित है कि यहां कुरु राज्य का कोषागार स्थित था। ‘मयराष्ट्र मानस’ में लिखा है हस्तिनापुर से तीन मील दूर बहसूमा उस महानगर का एक मोहल्ला था जहां कौरवों का कोष रहता था। यह वसु शब्द से बना है जिसका अर्थ कोष है।
बहसूमा-रामराज्य मार्ग में सैफपुर फिरोजपुर गांव में दुर्वासा ऋषि की पावन तपोस्थली है। बाहर प्राचीन तालाब है जो संरक्षण के अभाव में नष्ट हो रहा है। प्रांगण में शिव मंदिर है। जनश्रुति है कि इस मंदिर की छत नहीं बनती।
लोगों ने छत बनाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए। स्थानीय जनों का मानना है कि यह महादेव की इच्छा है। भक्त विकास ने बताया कि पहले यहां जंगल था। गाय इस स्थान पर दूध गिराती थी। तब लोगों को इस शिवलिंग का पता चला। मंदिर के अहाते में दुर्वासा ऋषि की मूरत भी स्थापित है।
सुरेश कहते हैं, दुर्वासा ऋषि ने यहां तपस्या की है। कुंती और गांधारी इस स्थान पर दुर्वासा जी से विजय का वरदान मांगने आई थीं। शिवरात्रि पर यहां मेला लगता है।
इस तालाब का इतिहास किताबों में दर्ज है। ‘मयराष्ट्र मानस’ पुस्तक के अनुसार बहसूमा सड़क पर ईंटों का बना विशाल ताल है जिसे मुगल काल में जानसठ के केशवदास ने बनवाया था। बाद में मेरठ के किसी महाजन ने इसका जीर्णोद्धार कराया। इसी ताल के तट पर 300 वर्ष प्राचीन मंदिर है।