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महाभारत सर्किट:संघर्षों से भरा था पांडवों का जीवन,दुर्योधन ने बनाई थी ये योजना,कुछ ऐसी है कहानी

Mon, 09 Mar 2020 12:45 PM IST
कपिल kapil रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ

सार

पांडवों का जीवन संघर्षों से भरा था। दुर्योधन ने उन्हें लाक्षागृह में जलाकर मारने की योजना बनाई।
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खंडवारी कुटी स्थित सुरंग। फोटो : संजू - फोटो : अमर उजाला
पांडवों का जीवन संघर्षों से भरा था। दुर्योधन ने उन्हें लाक्षागृह में जलाकर मारने की योजना बनाई। इसके लिए लाख का लाक्षागृह तैयार कराया। विदुर ने पांडवों को इस षड़यंत्र के बारे में बताया। उनको बचकर निकालने के लिए सुरंग भी तैयार कराई। एक रात लाक्षागृह में आग लगाकर पांडव अपनी माता कुंती के साथ उसी सुरंग से बाहर निकल गए। यह कहानी सबको पता है। कौतुहल यह जानता है कि वहां से निकलकर पांडव कहां पहुंचे। इसका उत्तर खंडवारी कुटी देती है। बागपत में यमुना की खादर में यह प्राचीन स्थान है। बरनावा में बनाई गई सुरंग का अंत यहीं होता है। जनश्रुति है कि सुरंग से होते हुए कुंती पुत्र यहीं निकले थे। इसे पांडव कुटी भी कहते हैं। महाभारत काल के इतने अहम स्थल से सरकारी तंत्र ने मुंह फेर रखा है। वह खुद यहां तक नहीं पहुंचा है, श्रद्धालुओं को तो क्या पहुंचाएगा।
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काल भैरव - फोटो : अमर उजाला
सांझ ढले बागपत के फोटो जर्नलिस्ट कुलदीप निषाद के साथ ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होते हुए खंडवारी कुटी पहुंचे। पहले यमुना यहीं बहती थी। यदि साधु-संतो का डेरा न होता तो खादर में स्थित यह कुटी कब की नष्ट हो गई होती। यहां रहने वाले कंवरनाथ हमें सुरंग का बाहरी हिस्सा दिखाते हैं। बताते हैं, पहले यहां वन था। सुरंग के रास्ते से जंगली जानवर आ जाते थे। करीब 60 साल पहले बाबा वृद्धराम ने इसे बंद करा दिया।
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मंदिर - फोटो : अमर उजाला
पांच-सात साल से इस स्थान का उद्धार हुआ है। हमने आपसी चंदे से ही सुधार किया। सीएम योगी को भी इसके पुनरुद्धार का प्रार्थना पत्र दिया लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। हमसे जो बन पड़ा, वह किया। यह पांच हजार वर्ष पुरानी टेक है। यह विदुर की बनाई कुटी है। लाक्षागृह से निकलकर पांडव यहीं रहे। यहां काल भैरव की पुरानी मूर्ति है।

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मंदिर - फोटो : अमर उजाला
यहां अश्वत्थामा करते हैं पूजा 
बागपत के जगद्गुरु शंकराचार्य आश्रम कृष्णबोध पीठ पक्का घाट मंदिर में पांडवों द्वारा स्थापित शिवलिंग विराजमान है। किवदंती है कि शिवरात्रि पर अश्वत्थामा यहां जल चढ़ाने आते हैं। मंदिर के प्रभारी ब्रह्मचारी दिव्यानंद ने बताया, लाक्षागृह से निकलकर पांडव खंडवारी कुटी आए। यहां उन्होंने शिवलिंग की स्थापना की। यमुना यहां से पास है। करीब करीब 50 साल पहले कालिंदी के किनारे पक्का घाट बन गया। तब से यह पक्का घाट वाला मंदिर कहलाया।
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मंदिर - फोटो : अमर उजाला
श्रीकृष्ण ने दिया वाकप्रस्थ नाम  
इतिहासकार केके शर्मा के अनुसार बागपत उन पांच गांवों में से एक है जो पांडवों ने कौरवों से मांगे थे। बागपत का नाम वृक स्थल था। कौरव-पांडवों के युद्ध से पहले कृष्ण संधि के लिए गए थे। तब वह रात्रि में इस वृक स्थल में रुके थे। महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा है कि यहां कृष्ण का स्वास्तिवाचन से स्वागत हुआ। वृक स्थल के लोग वाक पटु थे, श्रीकृष्ण उनसे प्रभावित हुए। उन्होंने इस स्थान का नाम वाकप्रस्थ रखा। जिसका अपभ्रंश बागपत है। ऐसा मेरा मानना है।
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पुजारी - फोटो : अमर उजाला
बागपत से बड़ौत की तरफ यमुना नदी के किनारे के गांव जागोस, ककोर, कुरड़ी, छपरौली, ईसापुर टील में में टीले हैं। सर्वेक्षण में मैंने वहां से चित्र धूसर मृद भांड पाया है जो महाभारत कालीन है। इससे पता चलता है कि ये सभी बस्तियां महाभारत कालीन हैं।

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