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दनकौर: एकलव्य की साधना व द्रोण की दक्षिणा का ठौर, जहां है शिष्य द्वारा बनाई गुरु की दुर्लभ मूरत

Mon, 16 Mar 2020 02:23 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
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दनकौर में द्रोणाचार्य का प्रााचीन मंदिर - फोटो : अमर उजाला
एकलव्य की साधना और द्रोण की गुरु दक्षिणा का ठौर है दनकौर। गौतमबुद्ध नगर जिले के इस कस्बे में एकलव्य द्वारा अपने हाथों से बनाई गई द्रोणाचार्य की दुर्लभ मूरत के दर्शन कर सकते हैं। दनकौर द्रोणाचार्य की नगरी है। कहा जाता है कि उनका एकमात्र मंदिर यहीं है। यही नहीं इस स्थान पर आपको द्रोण कुंड के भी दर्शन होंगे, जहां स्नान करते हुए दुर्वासा ऋषि का कमंडल बह गया था : -

 
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दनकौर में द्रोणाचार्य का प्रााचीन मंदिर - फोटो : अमर उजाला
जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया तो वह उनकी मूरत बनाकर भ्यास करने लगे। द्रोण ने इसी स्थान पर एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगा था। जिसे उन्होंने सहर्ष ही काटकर अपने गुरु को दे दिया। महाभारत काल के इतने अहम स्थल पर धार्मिक पर्यटन को विकसित करने के वादे बहुत हुए लेकिन धरातल सूना है। 

 
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बांके बिहारी का मंदिर। - फोटो : अमर उजाला
प्राचीन द्रोणाचार्य मंदिर के पास द्रोण कुंड है। दोनों स्थान एएसआई द्वारा संरक्षित है। द्रोणाचार्य का मंदिर छोटा लेकिन अत्यंत कलात्मक है। दीवारों पर चित्रकारी है। गर्भगृह में एकलव्य द्वारा बनाई गुरु द्रोणाचार्य की मूरत दर्शनीय है। भक्तों के पूजन-अर्चन के लिए द्रोणाचार्य की नवीन मूर्ति स्थापित की गई है। प्रांगण में दूसरा मंदिर बांके बिहारी का है। गर्भगृह के पट खुलते ही नयन मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सामने बांके बिहारी की मनोहारी छवि है। 
 

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एकलव्य द्वारा बनाई गुरु द्रोणाचार्य की मूरत - फोटो : अमर उजाला
मंदिर कमेटी के महासचिव लक्ष्मीनारायण बताते हैं कि एकलव्य द्रोणाचार्य की इस मूर्ति के सामने धनुर्विद्या सीखते थे। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से यह मूरत बनाई थी। दनकौर में ही द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उनके दाहिने हाथ का अंगूठा गुरु दक्षिणा में मांगा था। मंदिर की देखरेख कमेटी करती है। विश्व में द्रोणाचार्य का यह एकमात्र मंदिर है। दूर-दूर से लोग यहां आते हैं। 

 
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दनकौर में द्रोणाचार्य मंदिर के पास द्रोण कुंड - फोटो : अमर उजाला
द्रोण कुंड   
द्रोण कुंड के बारे में प्रचलित है कि इसमें कितना भी पानी भर दो, तीसरे दिन यह खाली हो जाता है। किवदंती है कि पहले यह तालाब भरा रहता था। दुर्वासा ऋषि यहां आए। उन्होंने कुंड में स्नान किया। कुंड में उनका कमंडल बह गया। उन्होंने शाप दिया कि यह खाली रहेगा। तब से कुंड में पानी नहीं रहता।
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दनकौर में द्रोणाचार्य का प्रााचीन मंदिर - फोटो : अमर उजाला
जन्माष्टमी पर यहां आठ दिवसीय मेला लगता है जिसमें दंगल होता है। सरकारी स्तर पर इस स्थान के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया गया। सांसद महेश शर्मा ने मंदिर के लिए 66 लाख देने की घोषणा की थी पर कुछ भी नहीं मिला। 
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