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महाभारत सर्किट: परीक्षितगढ़ को अमृतमयी कूप, जिसमें झांकने पर ताजा हो जाती हैं पुरातन कथाएं

Mon, 02 Mar 2020 12:17 PM IST
Dimple Sirohi रैना पालीवाल, अमर उजाला, मेरठ
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
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जब रोग हरता है तो अमृत कहलाता है। फिर वह सिर्फ साधारण पानी नहीं बल्कि आम जन की आस्था की धारा बन जाता है। करीब पांच हजार वर्ष पहले नागराज वासुकी का कुष्ठ रोग दूर करने वाले अमृत कूप का जल अचला के गर्भ में चला गया। जब तक कूप में जल था, वहां लोग स्नान करते थे। इस कूप के रसातल में नवलदेह की कहानी सोई हुई है।

कहते हैं, पिता की रोग मुक्ति के बाद वह इसी कुएं में समा गई थी। कूप में झांकने पर पांच हजार वर्ष पुरानी कथा कल्पना के कैनवास पर उतर आती है।  इसे नवलदेह कूप भी कहा जाता है। करीब आठ साल पहले इसका जल स्तर नीचे चला गया। उससे पहले तक लोग  चर्म रोगों से मुक्ति के लिए इसके जल से स्नान करते थे। छह साल पहले कूप का जीर्णोद्धार कराया गया।
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
‘इतिहास पुण्य पुरातन किला परीक्षितगढ़’ में इस कूप की कथा का वर्णन है। अर्जुन और नागराज वासुकी में गहरी मित्रता थी। दोनों ने मित्रता को रिश्तेदारी में बदलने का तय किया। अर्जुन की पुत्रवधू उत्तरा ने परीक्षित को जन्म दिया। वासुकी के यहां कन्या पैदा हुई। नागवंशी खुद को कुरुवंशियों से श्रेष्ठ समझते थे। वासुकी ने नवलदेह का पालन गुप्त रूप से किया। 

जनश्रुति है कि उसने नवलदेह को भौंरे में डलवा दिया। वासुकी को कुष्ठ रोग हो गया। राज ज्योतिषी ने कहा कि यदि नवलदेह परीक्षितगढ़ के अमृत कूप से जल लाकर वासुकी को स्नान कराए तो यह दूर हो सकता है। तब नवलदेह अमृत कूप से जल लेने के लिए गई। गुप्तचरों द्वारा ज्ञात होने पर परीक्षित उसे अपनी मंगेतर बताते हुए विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। 
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
नवलदेह वापस आने का वादा कर चली जाती है। पिता को स्नान कराते समय वह अपने पैर के अंगूठे से उनका अंगूठा दबा लेती हैं। जल न पहुंचने के कारण वहां कुष्ठ     रोग रह जाता है। वासुकी के मना करने   के बावजूद नवलदेह पुनः कूप पर जाती है और परीक्षित से विवाह कर लेती है। यह भी उल्लेख मिलता है कि नवलदेह इसी कूप में समा गई। विवाह का उल्लेख पुराणों में नहीं मिलता। 

 

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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
स्वप्न के बाद कराया मंदिर का निर्माण
कस्बे में स्थित कात्यायनी देवी मंदिर की बहुत मान्यता है। राजा नैन सिंह ने संवत 1858 (सन् 1801) मंे मंदिर का निर्माण कराकर देवी की स्थापना की। जनश्रुति है कि माता ने उन्हें मंदिर बनवाने का स्वप्न दिया था। इस स्थान की खोदाई से काले हकीक पत्थर की मंशा देवी की मूर्ति भी मिली। वह भी मंदिर प्रांगण में सुशोभित है। यहां नव निर्मित वैष्णों धाम भी है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में मंदिर में मेला लगता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता की पूजा-अर्चना करने आते हैं। 
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hastinapur temple - फोटो : अमर उजाला
सिर्फ नाम में जिंदा है किला 
किला परीक्षितगढ़ में किला सिर्फ नाम में जिंदा है। कस्बे की गलियों में कुछ खंडहर और रानी के महल का द्वार देखकर ही सब्र करना पड़ता है। ‘मयराष्ट्र मानस’ पुस्तक में लिखा है कि राजा परीक्षित द्वारा निर्मित किले के अवशेषों पर ही राजा नैन सिंह ने किले का निर्माण कराया था। जो अब चंद खंडहरों में बचा है। जबकि इस कस्बे की पहचान ही किला परीक्षितगढ़ नाम से है। 
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