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सियासी सरगर्मी से दूर कवाल में नेताओं ने नहीं रखा कदम, यहीं से भड़का था मुजफ्फरनगर दंगा 

Mon, 25 Mar 2019 05:53 PM IST
दुष्यंत शर्मा गिरिराज सिंह, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
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कवाल में ट्यूबवैल पर बैठे किसान - फोटो : अमर उजाला
देश की सियासत की दिशा बदल देने वाले कवाल गांव में बीते पांच साल में कुछ नहीं बदला। वर्ष 2013 में हुए कवाल कांड के बाद भड़के दंगे के बाद भले ही यह गांव राजनीति का अखाड़ा बन गया था, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद नेताओं ने इस ओर रुख नहीं किया।

बीते पांच वर्षों में क्षेत्रीय सांसद और विधायक भी नहीं पहुंचे और न ही उनकी निधि से गांव में कोई काम हुआ। इस क्षेत्र में पहले चरण में चुनाव होना है, लेकिन किसी भी दल के उम्मीदवार ने अभी तक गांव में कदम नहीं रखा।
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इसी चौक से भड़का था मुजफ्फरनगर दंगा - फोटो : अमर उजाला
मुजफ्फरनगर जिले का कवाल गांव बिजनौर लोकसभा क्षेत्र की मीरापुर विधानसभा क्षेत्र में आता है। 27 अगस्त 2013 को गांव में हुए दोहरे हत्याकांड के बाद मुजफ्फरनगर में दंगे भड़क उठे और यह गांव देशभर की राजनीति का केंद्र हो गया। अधिकांश दलों के राष्ट्रीय नेताओं ने गांव में हाजिरी लगाई, लेकिन चुनाव बीतते ही सब ने मुंह मोड़ लिया।

कवाल निवासी ब्रजपाल उर्फ भूरा बताते हैं कि बिजनौर सांसद भारतेंद्र सिंह बीते पांच वर्षों में गांव में नहीं आए। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर मीरापुर से विधायक बने अवतार भड़ाना ने भी दूरी बनाए रखी। अब तो वह पार्टी भी छोड़ गए। दोनों ने अपनी निधि से गांव में कोई काम नहीं कराया। मलिकपुरा निवासी तहेंद्र चौधरी कहते हैं कि गांव को जो तवज्जो मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली। 
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मलिकपुरा को जाने वाली सड़क पूरी तरह टूट चुकी है - फोटो : अमर उजाला
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पिछड़ा गांव
पानीपत-खटीमा हाईवे के किनारे बसा कवाल करीब 13 हजार की आबादी वाला गांव है। यहां आठवीं के बाद कोई स्कूल नहीं है। वर्ष 2013 में राजकीय कन्या इंटर कॉलेज बना था, लेकिन उसमें शिक्षकों की तैनाती नहीं हुई। बिल्डिंग खंडहर होती जा रही है। गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र प्रस्तावित था, लेकिन वह सिखेड़ा में बन गया।

पानी की टंकी बनी है। पाइप लाइन भी है, लेकिन पेयजल आपूर्ति नहीं होती। ग्राम प्रधान मोहम्मद इस्लाम बताते हैं कि ग्रामीण कनेक्शन नहीं लेना चाहते। गांव की गंदे पानी की निकासी की व्यवस्था ठप है। मोहम्मद सुहेल व अनवार तस्दीक करते हैं कि राजनेताओं ने गांव को भूला दिया है। हत्याकांड में मारे गए शाहनवाज के पिता सलीम भी इनकी बात को दोहराते हैं। कहते हैं कि नेताओं ने केवल वोट बटोरे हैं। गांव का विकास मुद्दा नहीं रहा।

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कवाल का प्रवेश द्वारा - फोटो : अमर उजाला
कवाल कांड के बाद भड़का था दंगा
27 अगस्त 2013 को कवाल गांव के चौराहे पर मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या कर दी गई थी। इस घटना में दूसरे पक्ष के शाहनवाज की भी मौत हुई थी। घटना के पीछे छात्राओं से छेड़छाड़ को वजह बताया गया था।

हालांकि रिपोर्ट में कवाल निवासी शाहनवाज और मुजस्सिम पक्ष की बाइक से गौरव की साइकिल भिड़ऩे के बाद वारदात होना दर्शाया गया। हत्याकांड के बाद मुजफ्फरनगर में दंगा भड़क गया था। इस कांड ने देश की राजनीति को पूरी तरह बदलकर रख दिया था। मुजफ्फरनगर का यह गांव बिजनौर लोकसभा की मीरापुर विधानसभा में आता है।
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कवाल में ट्यूबवैल पर बैठे किसान - फोटो : अमर उजाला
गांव में मतदाताओं का ध्रुवीकरण
कवाल गांव में करीब 7800 मतदाता हैं। हिंदू-मुस्लिम की मिश्रित और बराबर आबादी वाले इस गांव में वोटों का धु्व्रीकरण नजर आ रहा है। ग्राम प्रधान मोहम्मद इस्लाम के अलावा ग्रामीण ब्रजपाल भी इस बात को मानते हैं। दोनों कहते हैं कि कोई प्रत्याशी प्रचार को आए या नहीं। वोट तो जहां जाना है, वहीं जाएगा।

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