देश की सियासत की दिशा बदल देने वाले कवाल गांव में बीते पांच साल में कुछ नहीं बदला। वर्ष 2013 में हुए कवाल कांड के बाद भड़के दंगे के बाद भले ही यह गांव राजनीति का अखाड़ा बन गया था, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव के बाद नेताओं ने इस ओर रुख नहीं किया।
बीते पांच वर्षों में क्षेत्रीय सांसद और विधायक भी नहीं पहुंचे और न ही उनकी निधि से गांव में कोई काम हुआ। इस क्षेत्र में पहले चरण में चुनाव होना है, लेकिन किसी भी दल के उम्मीदवार ने अभी तक गांव में कदम नहीं रखा।