अंतरिक्ष महिला यात्री कल्पना चावला, बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा, टेनिस स्टार सानिया मिर्जा, क्रिकेटर मिताली राज और नारी शिक्षा के लिए मिसाल बन चुकीं मलाला यूसुफजई समाज का सफल चेहरा हैं। इनकी सफलता की पूरी दुनिया मुरीद है। हमारी बेटियों की भी समाज और विश्व में अलग पहचान है। जिनके संघर्ष से सफलता की नई पौध तैयार हो रही है। शहर के ये कामयाब चेहरे युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं। जिन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियाड में पदक जीते, हौसले से एवरेस्ट की ऊंचाई भी नापी। चक्का फेंक, भाला फेंक में कीर्तिमान बनाए। गीता के श्लोक सुनाकर मजहबी एकता का संदेश दिया, सौंदर्य प्रतियोगिता जीतकर विश्वविजेता बनीं। गांव की मिट्टी से निकलकर सफलता का आसमां छुआ।
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अलका तोमर
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अलका तोमर
- फोटो : अमर उजाला
कुश्ती में वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदक जीतने वाली देश की दूसरी खिलाड़ी हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 रेसलिंग में गोल्ड मेडलिस्ट हैं। 20 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पदक जीते हैं। सीसीएसयू की यह खिलाड़ी 57 किग्रा भार वर्ग में खेलती थीं। अब भारतीय महिला कुश्ती टीम की कोच हैं। अर्जुन अवार्डी हैं। इन्हें यश भारती भी मिला है। गीता-बबीता फोगाट की गुरु भी हैं।
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सीमा पूनिया
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सीमा पूनिया
- फोटो : अमर उजाला
मोदीपुरम निवासी सीमा पूनिया डिस्कस थ्रो में विश्व विजेता हैं। विश्व स्तरीय एथलीट सीमा पूनिया कॉमनवेल्थ गेम्स 2006 में रजत, कॉमनवेल्थ 2010 में रजत और कॉमनवेल्थ 2014 में ब्रांज मेडल जीत चुकी हैं। जूनियर वर्ग में वर्ल्ड चैंपियन हैं।
वंदना कटारिया
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वंदना कटारिया
- फोटो : अमर उजाला
भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रहीं वंदना कटारिया एनएएस डिग्री कॉलेज के मैदान पर हॉकी की प्रैक्टिस करते हुए आगे बढ़ीं। वंदना के निर्देशन में ही भारतीय महिला हॉकी टीम ने 2016 में रियो ओलंपिक में भाग लिया। राष्ट्रीय स्तर पर वंदना कई पदक जीत चुकी हैं।
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गांव में रहकर भी हो सकते हैं सफल
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सौम्या गुप्ता
- फोटो : अमर उजाला
मुझे लगता था कि उच्च घरों के लोग ही सफल हो सकते हैं। सफल परिवार से ही सफल लोग निकलते हैं, लेकिन अपने शहर की बेटी अलका तोमर की सफलता ने मेरी सोच बदल दी। अलका को मैंने कुश्ती के मैदान में खेलते देखा। विवि के हॉल में अलका प्रैक्टिस करते हुए विश्व फलक पर चमकी। तब अहसास हुआ कि सफलता को मेहनत चाहिए संसाधन नहीं। - सौम्या गुप्ता, वर्किंग वुमन कंकरखेड़ा
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प्रेरित करते हैं लोकल हीरो
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संध्या कश्यप
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जितनी भी सेलिब्रिटीज हैं वो किसी न किसी छोटे शहर से निकली हैं। लेकिन हम बड़े शहरों की चकाचौंध में नजर आने वाली उन सेलिब्रिटीज को अपना आइडल बना लेते हैं, जबकि हमारे शहर में सीमा पूनिया, तूलिका रानी जैसे नाम हैं। एक साधारण लड़की कैसे एवरेस्ट विजेता बनी यह बात प्रेरित करती है। इनके बारे में पढ़कर मैंने भी अपना ड्रेस डिजायनर बनने का सपना पूरा करने को कदम उठाया और अपना ब्रांड खोला। सीमा भी काफी प्रभावित करती हैं। - संध्या कश्यप, ड्रेस डिजायनर जेल चुंगी
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अपने शहर में मिला आइडल
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वैशाली कौशिक
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मुझे खेलों में काफी रुचि है। हमेशा साइना, सानिया और ज्वाला गट्टा को देखकर प्रभावित होती रही। लेकिन जब अपने ही शहर की बेटी अन्नू रानी को खेलते हुए देखा तो लगा कि मैं आइडल दुनिया में क्यों खोजूं। मेरे अपने शहर में ही संघर्ष से सफलता पाने के उदाहरण हैं। अन्नू रानी जब गांव की मिट्टी से निकलकर विश्व फलक पर नाम कमा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं। - वैशाली कौशिक, छात्रा डीएन कॉलेज
अन्नू रानी
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अन्नू रानी
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जैवलिन थ्रोअर अन्नू रानी बहादुरपुर गांव की बेटी हैं। गांव की मिट्टी से निकली अन्नू रानी एशियन गेम्स में ब्रांज मेडलिस्ट हैं। एशियन गेम्स में पदक पाने वाली देश की दूसरी महिला हैं। नेशनल रिकॉर्ड तोड़कर नेशनल मेडलिस्ट हैं। एनआईएस पटियाला में इन दिनों तैयारी कर रही हैं।
रजिया सुल्तान
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रजिया सुल्तान
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जॉनीखुर्द निवासी रजिया सुल्तान बाल अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वाली अकेली लड़की हैं। उन्हें यूएन कांफ्रेंस में पहला मलाला सम्मान देकर सम्मानित किया गया। देश से दो बेटियों का चयन इस सम्मान में हुआ। जिसमें रजिया का नाम भी शामिल हुआ।
दुनिया में क्यों खोजे अपने हीरो
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ज्योति
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हमें अपना हीरो खोजने के लिए दुनिया के किसी कोने में जाने की जरूरत नहीं। मुझे तो शाहरुख, सलमान से बड़ी अपने शहर की बेटी आलिया खान लगती है। जिसने गीता के श्लोक सुनाकर विश्व को एकसूत्र, भाईचारे के बंधन में बंधने का संदेश दिया। दसवीं की छात्रा सामान्य परिवार की बेटी आलिया ने पूरे समाज को धार्मिक एकजुटता में बंधने की प्रेरणा दी है। - ज्योति, इंवेंट ऑर्गेनाइजर साकेत
गीता गर्ल आलिया
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गीता गर्ल आलिया
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मजहबी एकता, भाईचारे का संदेश देकर सम्मानित होने वाली आलिया खान गीता गर्ल हैं। मुस्लिम बालिका आलिया ने गीता के श्लोक सुनाए, जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्था ने सम्मानित किया।
रजिया के संघर्ष से मिली प्रेरणा
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स्वाति सचदेवा
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पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई के बारे में पढ़ा तो बहुत अच्छा लगा। लेकिन जब जॉनी की बेटी रजिया सुल्तान को मलाला अवार्ड से सम्मानित किया गया तो मैं इनकी प्रशंसक बन गई। गांव से निकलकर रजिया यूएन कांफ्रेंस में पहुंचीं, यह गर्व की बात है। इनसे प्रेरित होकर मैंने अपनी टीचिंग जॉब के साथ चॉकलेट मेकिंग का काम भी शुरू किया। पहले असफल हुई, लेकिन लगातार प्रयास से सफलता मिलती चली गई। - स्वाति सचदेवा, बिजनेस वुमन वैशाली कालोनी
नाजरीन
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नाजरीन
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वर्ल्ड मुस्लिमा ब्यूटी कांटेस्ट की रनरअप बनीं मेरठ की नाजरीन ने हिजाब की ओट से सौंदर्य प्रतियोगिता जीती। मेरठ की यह बेटी उन तमाम बेटियों के लिए प्रेरणा हैं जो परंपराओं की परिपाटी में बंध जाती हैं।
तूलिका रानी
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तूलिका रानी
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माउंट एवरेस्ट की चोटी पर तिरंगा फहराकर लक्ष्मीबाई अवार्ड जीतने वाली मेरठ की बेटी तूलिका रानी में गजब का उत्साह है। इन्होंने ईरान के सबसे खतरनाक और गर्म ज्वालामुखी पर भी तिरंगा फहराकर नया कीर्तिमान बनाया। तूलिका वायुसेना में स्कवाड्रन लीडर रही हैं।
बदली सोच, दिखी सही राह
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चांदनी
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तमाम पाबंदियों में रहकर हम आगे नहीं बढ़ सकते, मुझे हमेशा यह लगता था। लेकिन जब मैंने वर्ल्ड मुस्लिमा कांटेस्ट की रनरअप शहर की नाजरीन को देखा, उसके बारे में पढ़ा तो यह सोच एकदम बदल गई। नाजरीन ने साबित कर दिया कि पर्दे में रहने के बावजूद भी अपने सपने पूरे किए जा सकते हैं। हम लड़कियां भी आगे बढ़ सकती हैं। - चांदनी, शिक्षिका, कासमपुर कैंट
तूलिका की कहानी से मिली प्रेरणा
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शहजा
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मैंने एवरेस्ट फतह करने वाली बेटी तूलिका रानी का इंटरव्यू पढ़ा था। जिसमें तूलिका ने कहा कि उसने अपने सपने को पूरा करने के लिए अपनी सारी सैलरी, सारी सेविंग लगा दी। दो महीने की मेहनत के बाद तूलिका एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं। उनके पैरों में चोट भी लगी। मुझे भी सपनों को पूरे करने का जज्बा मिला। मैंने भी अपना शिक्षिका बनने का सपना पूरा करने के लिए मेहनत की और सफल हुई।- शहजा, शिक्षिका केएल इंटरनेशनल स्कूल
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत 1914 में हुई। 1908 में अंतरराष्ट्रीय महिला गारमेंट मजदूर यूनियन की हड़ताल हुई। इसमें महिलाओं के मुद्दों को उठाया गया। इस हड़ताल के बाद सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने 28 फरवरी 1909 में न्यूयार्क में पहली बार महिला सभा का आयोजन किया। इस आयोजन में महसूस हुआ कि कोई ऐसा दिन हो जो महिलाओं के हक की बात करे। तभी अगस्त 1910 में अंतरराष्ट्रीय महिला सभा ने एक आम सभा का आयोजन कोपेहनगन डेनमार्क में किया। महिलाओं के हकों के प्रति जागरूकता फैलाने व सम्मान के लिए 1914 में पहली बार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। जर्मनी में इस दिन की शुरुआत हुई। विश्व स्तर पर हर साल 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाने लगा।
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