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क्रांतिकारियों ने अंग्रेज अफसर को मारकर फहराया था लालकिले पर तिरंगा, पढ़ें- 1857 का पूरा इतिहास

Fri, 10 May 2019 03:43 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
वह 09 मई 1857 की शाम थी। मेरठ में सब कुछ शांत था। इसी बीच एक अंग्रेज अफसर को एक देसी अफसर ने जानकारी दी कि कल क्रांति होने वाली है। अंग्रेज अफसर कर्नल स्मिथ ने इसे मजाक समझा। उन्हें शायद इस बात का इल्म नहीं था कि यह क्रांति की कोई मामूली चिंगारी नहीं, बल्कि एक ऐसा शोला है जो पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को झुलसा कर रख देगा...

10 मई 1857 को भारतीय सिपाहियों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेज अफसर को मारकर किया दिल्ली कूच, लालकिले पर फहराया था तिरंगा...! अगली स्लाइडों में पढ़िए 1857 की क्रांति का पूरा इतिहास:-
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
10 मई की शाम पांच बजे आखिरकार क्रांति की चिंगारी फूट पड़ी। भीड़ तलवारों और भालों के साथ सड़कों पर आ गई। आगे काली पलटन के जवान और पीछे भीड़ सेना के परेड ग्राउंड पर पहुंच गई। सदर बाजार से लेकर परेड ग्राउंड तक मारो-मारो का शोर मच रहा था। भीड़ का नेतृत्व छावनी के पुलिसकर्मी कर रहे थे। इसी बीच फायरिंग शुरू हो गई। 20वीं पैदल सेना के सैनिकों ने सबसे पहले कर्नल फिनिश को परेड ग्राउंड में गोलियों से छलनी किया। इसके बाद तो अंग्रेज अफसरों की शामत सी आ गई। कप्तान डोनाल्ड भी परेड ग्राउंड पर मारा गया। 11वीं देसी सेना ने शस्त्रागारों के ताले तोड़ दिए। 20वीं पैदल सेना ने लेफ्टिनेंट हेंडरसन को गोली मार दी। क्रांतिकारी ग्रामीणों ने मेजर टेलर को मौत के घाट उतारा। इसके बाद नौ मई को कोर्ट मार्शल करके जिन 85 सैनिकों को जेल में बंद किया गया था, उन्हें देसी सैनिकों ने छुड़ा लिया।
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
निशाने पर थे अंग्रेज अफसरों के घर 
क्रांतिकारियों ने कस्टम हाउस जला दिया। अंग्रेजों के बंगलों में आग लगानी शुरू हो गई। 10 मई की रात पूरे मेरठ में क्रांति का शोर सुनाई देने लगा। रात करीब दो बजे क्रांतिकारियों ने नई जेल पर हमला करके 839 कैदियों को आजाद कराया। सैनिकों के साथ छोटे बड़े क्रांतिकारियों के दल दिल्ली कूच कर गए। 11 मई को लालकिले पर झंडा फहराकर बहादुरशाह जफर को हिंदुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया गया।

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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
इन जगहों पर हुआ कत्लेआम
10 मई 1857 को मेरठ में कई जगहों पर कत्लेआम हुआ। खूनी पुल पर तो अनेक अंग्रेजों का कत्ल किया गया। सैनिकों को गायें व सुअर की चर्बी से बने कारतूस चलाने का आदेश देने वाला थर्ड कैवेलरी का कमांडिंग ऑफिसर कारमाइकल स्मिथ के वेस्ट एंड रोड स्थित बंगले को निशाना बनाया गया था। हालांकि कारमाइकल पहले ही फरार हो गया था। एक अन्य बंगले में मिसेज चैंबर को क्रांतिकारियों ने मार डाला। वर्तमान में मिलिट्री कैंटीन की जगह पशु चिकित्सक चार्ल्स डाउन का निवास था। डाउन और उनकी पत्नी ने क्रांतिकारियों पर गोली चला दी। इसके बाद भीड़ ने उनके बंगले में आग लगाकर उन्हें मार डाला।
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
इन गांवों का रहा अहम योगदान
क्रांति की चिंगारी भड़काने में गगोल, पांचली खुर्द, बसोद, सीकरी खुर्द आदि गांवों के लोगों की अहम भूमिका रही। इसके अलावा बाबा औघड़नाथ मंदिर का इस क्रांति को जन्म देने में अहम योगदान रहा। यहां पर फकीर के वेश में क्रांति के नायक सिपाहियों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने को प्रेरित करते थे।
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
शहर में फैली थीं कई अफवाह
नौ मई को यह अफवाह शहर में फैल गई थी कि 200 बेड़ियां बनवाई जा रही हैं। जिससे काली पल्टन यानी भारतीय सैनिकों को बंदी बनाया जाएगा। यह भी अफवाह थी कि हड्डियों के चूर्ण से मिश्रित आटा बनवाया जा रहा है, जिसे बाजार में बेचा जाएगा। ऐसी कई अफवाह के चलते क्रांति में सैनिकों के साथ आम लोग भी जुड़ते गए। नौ मई 1857 को आजादी की यह पहली लड़ाई मेरठ से शुरू होकर 20 जून 1858 को ग्वालियर में खत्म हुई।
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धन सिंह कोतवाल ने दिया अहम योगदान - फोटो : अमर उजाला
धन सिंह कोतवाल ने दिया अहम योगदान
10 मई 1857 की क्रांति में धन सिंह कोतवाल का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। क्रांति के समय अंग्रेजों ने सिपाहियों को आसपास गांवों में जाकर क्रांतिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए कहा था। इस दौरान धन सिंह कोतवाल ने अपनी जान पर खेलकर ग्रामीणों तक इसकी सूचना पहुंचाई थी। साथ ही क्रांति में अहम योगदान दिया।

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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
1857 की मुख्य तारीखें  
. 8 अप्रैल - मंगल पांडे को फांसी दी गई।
. 9 मई - चर्बी युक्त कारतूस चलाने का विरोध करने पर भारतीय सैनिकों का कोर्टमार्शल हुआ।
. 10 मई - 85 सैनिकों ने अंग्रेजी हुुकूमत का विरोध किया।
. 11 मई - सिपाहियों का दिल्ली पर कब्जा।
. 13-31 मई - देश के विभिन्न जिलों में विरोध शुरू।
. 01-05 जून - मुरादाबाद, बदायूं, आजमगढ़, सीतापुर में विरोध शुरू।
. 06 जून - नानासाहेब की फौज द्वारा कानपुर का घेराव।
. 07-8 जून - झांसी का किला फतह।
. 09-13 जून - फतेहपुर, दरियाबाद और नौगांव में विद्रोह।

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फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
आज भी ताजा हैं क्रांति की यादें
शहर में जहां-जहां अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति हुई, उन जगहों पर पत्थर, शिलालेखों एवं कृतियों के माध्यमों से उनको पहचान दी गई है। राजकीय स्वतंत्रता संग्राम संग्रहालय, माल रोड, बाबा औघड़नाथ मंदिर समेत इन स्थलों पर क्रांतिकारियों के बलिदान का इतिहास देखने को मिलता है।

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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
इन 85 सैनिकों ने जगाई क्रांति की अलख
हवलदार मातादीन, शेख पीरअली नायक, अमीर कुदरत अली नायक, शेख हुसैनुद्दीन, शेख नूर मोहम्मद नायक, शीतल सिंह, जहांगीर खान, मीर मोसिन अली, अलीनूर खां, मीर हुसैन बख्श, मथुरा सिंह, नारायण सिंह, लाल सिंह, सौदान सिंह, शेख हुसैना बक्श, साहिब दाद खान, विसन सिंह, बलदेव सिंह, शेख नुंदू, नवाब खां, शेख रमजान अली, मोहम्मद खान, मक्खन सिंह, दुर्गा सिंह प्रथम, नसरल्ला बेग, मेहराब खान, दुर्गा सिंह द्वितीय, नबीबक्ष खान, जूरखान सिंह प्रथम, नुदजू खान, जूर खान सिंह द्वितीय, अब्दुल्ला खान, इसेन खान प्रथम, जबरजस्त खान, मुर्तेजा खान, मरजूर सिंह, अजीमुल्लाह खान प्रथम, अजीमुल्लाह खान द्वितीय, काला खान, शेख साधु लल्ला, सालार बक्श खान, शेखरुत अली, द्वारका सिंह, कालका सिंह, रघुवीर सिंह, बलदेव सिंह, दर्शन सिंह, इदाद हुसैन, पीर खान प्रथम, मोती सिंह, शेखफजल इमाम, हीरा सिंह, सेवा सिंह, मुरादशेर खान, शेख आरामअली, काशी सिंह, अशरफ अली खान, कादर दाद खान, शेख रुस्तम, भगवान सिंह, मीर इम्दाद अली, शिवबक्ष सिंह, लक्ष्मण सिंह, शेख इमामबक्श, उस्मान खान, दरियाव सिंह, मसूद अली खान, शेख गयास बख्श, शेख उन्मेद अली, अब्दुल वहाब खान, रामसहाय सिंह, पन्हा अली खान, लक्ष्मण दुबे, रामशरण सिंह, शेख ख्वाजा अली, शिव सिंह, शीतल सिंह, मोहन सिंह, विलायत अली खान, शेख मोहम्मद ख्वाजा, इंद्र सिंह, फतह खान, मेकू सिंह, शेख कासम अली व रामचरण सिंह आदि शामिल हैं।
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1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
यह था क्रांति का कौमी तराना
हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा
ये है हमारी मिल्कियत हिंदुस्तान हमारा
इसकी रुहानियत से रोशन है जग सारा
कितना कदीम कितना नईम
सब दुनिया से न्यारा
करती है जरखेज जिसे गंगा-जमुना की धारा
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा
नीचे साहिल पर बजता सागर का नक्कारा
इसकी खाने उगल रहीं सोना, हीरा, पारा
इसके शानो-शौकत का दुनिया में जयकारा
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
लूटा दोनों हाथों से प्यारा वतन हमारा
आज शहीदों ने है तुमको अहल-ए-वतन ललकारा
तोड़ो गुलामी की जंजीरें, बरसाओ अंगारा
हिंदू-मुस्लिम, सिख भाई-भाई प्यारा
यह है आजादी का झंडा
इसे सलाम हमारा

(यह गीत क्रांति के पूरे दौर में और उसके बाद भी गुनगुनाया जाता रहा। युवाओं में क्रांति की अलख जगाने के लिए गली-गली इसको गाया जाता था। अजीमुल्ला खां ने इस गीत की रचना की थी।)

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