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पिता के 'सपनों' में छिपा है दिव्या काकरान की कामयाबी का राज, देखें तस्वीरें

Wed, 22 Aug 2018 04:17 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
दिव्या काकरान के पिता सूरज और मां संयोगिता ने अखाड़े में बेटी को उतारने का फैसला लिया। अपने सपनों को बेटी के सहारे पूरा करने के मकसद से पिता ने पुरबालियान गांव छोड़ दिया और दिल्ली के गोकलपुर में किराये पर मकान ले लिया, ताकि बेटी को प्रशिक्षण दिला सके। आगे पढ़िए दिव्या के जीवन से जुड़ी खास बातें और जकार्ता में क्यों ऐतिहासिक रही दिव्या की जीत।
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दिव्या काकरान की जीत पर खुशी मनाते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
जकार्ता एशियाड में पुरबालियान की बेटी दिव्या काकरान ने 68 किलोग्राम फ्री स्टाइल स्पर्धा में कांस्य पदक जीत कर अपने दमखम की धाक का डंका बजा दिया है। 18वें एशियन गेम्स में उसका पदक इसलिए भी अहम है क्योंकि वह यूपी की अकेली पहलवान है, जो जकार्ता खेलने गई। 13 अप्रैल 2018 को गोल्ड कोस्ट में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भी दिव्या ने भारत के लिए ब्रांज मेडल जीता था। दिव्या की निगाहें अब वर्ष 2020 के टोक्यो ओलंपिक पर टिक गई है।
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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
मंसूरपुर क्षेत्र के गांव पुरबालियान की दिव्या काकरान ने पहली बार एशियाई खेलों में भाग लिया। फ्री स्टाइल स्पर्धा में चीनी ताइपे रेसलर चेन वेनलिंग को 10-0 से पटखनी देकर उसने देश को कांस्य पदक दिलाया। बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट के स्वर्ण पदक के बाद रेसलिंग में दिव्या दमदार प्रदर्शन से ब्रांज मेडल की मल्लिका बन गई।

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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
क्वार्टर फाइनल में मंगोलियाई पहलवान से 1-11 से हारने के बाद उसकी स्वर्ण पदक जीतने का सपना टूट गया था। मंगोलियाई खिलाड़ी के फाइनल खेलने की वजह से दिव्या को कांस्य पदक की कुश्ती का मौका मिला, जिसमें उसने चूक नहीं की। वर्ष 2018 दिव्या के लिए अभी तक कामयाबी का साल रहा। मई 2018 में उसने गीता फोगाट का हरा कर राष्ट्रमंडल खेलों में जगह बनाई। कॉमन वेल्थ में कांस्य पदक जीतने से पहले भिवानी में रितू को अपने दांव से चित कर भारत केसरी बनने का गौरव पाया।
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पिता के साथ दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
दिव्या की सफलता उसके संघर्ष की प्रेरक कहानी है। मंसूरपुर चीनी मिल के कर्मी बाबा राजेंद्र दंगलों में पहलवानी करते थे। उनकी कुश्ती परंपरा को दिव्या के पिता सूरज सेन पहलवान ने भी कायम रखा। अभाव से जूझती जिंदगी अखाड़ों से आगे बढ़ नहीं पाई। पिता के साथ उसे छोटी उम्र में दंगल में जाने के मौके मिले और यहीं से एक अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवान बनने की उम्मीदें जग गई।
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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
पिता सूरज और मां संयोगिता ने अखाड़े में बेटी को उतारने का फैसला लिया। अपने सपनों को बेटी के सहारे पूरा करने के मकसद से पिता ने पुरबालियान गांव छोड़ दिया और दिल्ली के गोकलपुर में किराये पर मकान ले लिया, ताकि बेटी को प्रशिक्षण दिला सके। दस साल की उम्र में वह दंगलों में लड़कों से दांव खेलती और चित करती।
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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
इस दौरान दिव्या ने दिल्ली, हरियाणा और वेस्ट यूपी के दंगलों में धाक जमा दी। कई मर्तबा लड़के उसके सामने लड़ने के बजाए मुकाबला छोड़ गए। राष्ट्रीय कुश्ती में दिव्या को शोहरत मिलने लगी।

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दिव्या काकरान की जीत पर खुशी मनाते ग्रामीण - फोटो : अमर उजाला
वहीं परिवार ने भी बेटी को आगे बढ़ाने में सब कुछ दांव पर लगा दिया। चार माह पहले ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में 68 किलोग्राम भार वर्ग में दिव्या में बांग्लादेश की सुल्ताना को हरा कर कांस्य पदक जीता था।
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दिव्या काकरान - फोटो : अमर उजाला
अब जकार्ता एशियाड में उसने देश को फिर से ब्रांज मेडल दिला कर अपने इरादे जता दिए हैं। दिव्या के पिता सूरज पहलवान का कहना है कि वर्ष 2020 के टोक्यो ओलंपिक में पदक लाना बेटी का एक संकल्प है।

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