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बेबस-गुमशुम और उदास चेहरा, कोरोना से ज्यादा भूख से मरने का डर, आंखों में सिर्फ आंसू, देखें तस्वीरें

Mon, 30 Mar 2020 04:18 PM IST
कपिल kapil सचिन त्यागी, अमर उजाला, मेरठ

सार

बेबस, गुमशुम और हर चेहरा उदास। जिन बच्चों को गोद में होना चाहिए था, वो भी सड़कों पर परिवार के साथ घिसटते- बिलखते पैदल चलते नजर आ रहे हैं।
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पैदल जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
बेबस, गुमशुम और हर चेहरा उदास। जिन बच्चों को गोद में होना चाहिए था, वो भी सड़कों पर परिवार के साथ घिसटते- बिलखते पैदल चलते नजर आ रहे हैं। मेरठ शहर की कोई सड़क ऐसी नहीं है, जहां पर वाहनों की तुलना में कई गुना ज्यादा पैदल यात्री न नजर आ रहे हों। लोग धूप में तीन- तीन माह के बच्चों को लेकर सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर हैं। ये वे लोग हैं जो अपने गांवों से आंखों में कुछ सुनहरे सपने लेकर शहरों में आए थे। मेहनत मजदूरी कर किसी तरह गुजर बसर कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन ने इन्हें सड़क पर ला दिया। जब भूखे पेट नहीं रहा गया तो झोला उठाकर निकल पड़े हैं अपने गांवों की ओर। इन लोगों की पीड़ा को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। जिससे बात करो यही कहता है, कोरोना का पता नहीं, भूख जरूर मार डालेगी।
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लॉकडाउन मेरठ - फोटो : amar ujala
तीन माह का बच्चा गोद में और चल पड़ी मां 
दोपहर दो बजे। दिल्ली रोड, संजय वन। तेज धूप में एक परिवार सिर पर थैले रखकर पैदल चला जा रहा था। तीन माह के बच्चे को सीने से चिपकाए और पसीने में तरबतर महिला की पीड़ा उसकी हालत बयां करने को काफी थी। बात हुई तो परिवार के मुखिया शहंशाह की आंखें नम हो गईं। बताने लगे कि शहाजहांपुर से पत्नी सितारा, पांच साल की बेटी अमरीन, बहन हिना, बहनोई और उसके छह माह के बच्चे के साथ मेरठ में कमाने आए थे। तीन माह पहले एक बेटा भी हो गया। रिठानी के पास एक फैक्ट्ररी में काम कर रहे थे। लॉकडाउन के बाद फैक्ट्ररी बंद हुई तो खाने के लाले पड़े गए। सब लोग गांव जा रहे हैं, वहां किसी तरह गुजर बसर हो जाएगी। कोरोना के बारे में पूछने पर कहा कि बीमारी का तो पता नहीं, लेकिन यहां रहे तो भूख से जरूर मर जाएंगे। आगे बढ़ते हुए बोले कि कोई वाहन मिला तो ठीक नहीं तो पैदल ही तय कर लेंगे 350 किमी का सफर।
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पैदल जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
कमाने वाले बेटे तो चल बसे 
धूप में बेहाल 65 साल की बुजुर्ग महिला बस चले जा रही थीं। मानो अपनी सुधबुध खो बैठी हों। बात हुई तो निढाल होकर पेड़ के नीचे बैठ गईं। किसी तरह सांसों को काबू किया। पूछने पर बताया कि उनका नाम सुमित्रा है। वे टीपीनगर क्षेत्र में गोपाल चांदना के गोदाम के पास गली में किराए पर रहती हैं। घर में दो बेटी और दो पोते हैं। बेटों की मौत हो चुकी है। बहू घर छोड़कर चली गई है। परिवार की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। एक रिश्तेदार पर रिठानी में कुछ पैसे थे, लेने गईं लेकिन वह नहीं मिला। इतना कहकर वह रोने लगीं। बताती हैं कि उनका न किसी ने राशन कार्ड बनाया, न ही कोई पेंशन है। कमाने वाले बेटे तो चले गए अब बच्चों को कैसे पालूं। शहर में हजारों ऐसे परिवार लॉकडाउन में लाचार हैं। जिनके घर का चूल्हा बंद हो चुका है।

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पैदल घर जाते लोग - फोटो : अमर उजाला
बीमार मां बुला रही, घर आ जाओ 
सुबह 11:30 बजे। परतापुर फ्लाईओवर पर एक परिवार किसी वाहन के इंतजार में खड़ा था। दो पुरुष, दो महिलाएं और चार बच्चे। ये लोग इतनी दहशत में थे कि बात करते ही सहम गए। घर के मुखिया देवेंद्र ने बताया कि कन्नौज के छिबरामऊ से पत्नी, दो बच्चे और भाई के परिवार के साथ परतापुर क्षेत्र में रहकर नौकरी कर रहा था। लॉकडाउन में सब बंद हो गया तो खाने के लाले पड़ गए। कैंसर से पीड़ित मां ने कल फोन कर कहा कि मेरा अब कुछ नहीं पता। तुम लोग इस हाल में वहां कैसे रह पाओगे। दो चार दिन बाद पैसे खत्म हो जाएंगे तो बच्चों का क्या होगा। मां ने बोला कि यहां रहकर भी जिंदगी चल जाएगी। अब घर आ जाओ एक रोडवेज बस रुकी तो उनकी सांस में सांस आई कि अब किसी तरह कन्नौज निकल जाएंगे।
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लॉकडाउन मेरठ - फोटो : amar ujala meerut
बस किसी तरह गांव पहुंच जाएं 
दोपहर 12:30 बजे। रिठानी में कई परिवार सिर पर सामान रखकर लड़खड़ाते कदमों से चले जा रहे थे। पूछने पर बताया कि 21 लोग मेरठ के सेंट पैट्रिक स्कूल में लखीमपुर खीरी से चिनाई का काम करने आए थे। सबसे बुजुर्ग भगवानदीन बताते हैं कि तनख्वाह भी छोड़कर जा रहे हैं। सिर्फ कुछ कपड़े और थोड़ा सा खाने का सामान साथ है। कोरोना के डर से जा रहे हो क्या, पूछे जाने पर वे सब एक साथ बोल पड़ते हैं... कोरोना से डर नहीं है, लेकिन भूख मार देगी तो क्या करेंगे। अब तो भगवान से यही प्रार्थना है कि किसी तरह अपने गांव पहुंच जाएं। माहौल ठीक होगा तो फिर आ जाएंगे। इतना कहकर महिलाएं और पुरुष तेजी से चलना शुरू कर देते हैं।

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