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कमाल है इन महिलाओं का हौसला... नहीं मानी हार, लिख डाली जीवन की नई कहानी

Mon, 19 Oct 2020 02:33 PM IST
कपिल kapil शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ
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काजल, आस्था और रितु - फोटो : अमर उजाला
इनका हर कदम पर विरोध हुआ, लोगों ने ताने मारे, लेकिन महिलाओं का हौसला कम नहीं हुआ। हवा के विपरीत रुख में आत्मा की शक्ति समेटकर ये मंजिल की ओर बढ़ती चली गईं। मां चंद्रघंटा का साहस, प्रेम इन महिलाओं की वाणी से सहसा झरता है। तीसरे नवरात्र पर हम बात करेंगे ऐसी महिलाओं की जिनके सामने विरोध की आंधी भी हार मान गई।
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रितु - फोटो : अमर उजाला
कबड्डी की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी रितु हवा के विरुद्ध उड़कर अपनी राह बना रही हैं। बचपन में रितु की मां चल बसीं, 2013 में पिता का साया भी न रहा। वह कहती हैं भाइयों की शादी हुई तो पढ़ाई छूट गई। भाइयों ने घर से निकाल दिया। तब मैंने निजी कंपनी में नौकरी की। स्कूलों में एडवेंचर गेम का सेटअप लगाकर खर्चा चलाती हूं। माउंट एवरेस्ट पर जाने की इच्छा है। 
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साधना - फोटो : अमर उजाला
गरीबों के लिए खोला स्कूल
सैनिक विहार निवासी साधना बुढ़ाकोटी ने गरीब बच्चों, महिलाओं को नि:शुल्क शिक्षा देने के लिए स्कूल खोला है। वह कहती हैं कि झुग्गियों में रहने वालों का जीवन पीड़ादायक है। पहले इन बच्चों और लोगों को कपड़े, सामान देकर मदद कर देती थी। फिर मैंने अपने पति की सहायता से यहीं सैनिक विहार में एक छोटा सा स्कूल खोल दिया। यहां महिलाओं, बच्चों को नि:शुल्क पढ़ाती हूं, सिलाई, बुनाई, कढ़ाई सिखाती हूं। 

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काजल - फोटो : अमर उजाला
पीएल शर्मा रोड निवासी काजल ने फैशन डिजाइनिंग की शिक्षा ली और गुड़गांव में नौकरी करने लगी। कुछ समय बाद काजल मेरठ घर आईं तो देखा कि मलिन बस्ती के बच्चों, महिलाओं की हालत बहुत खराब है। नौकरी छोड़कर समाजसेवा में जुट गईं। दोस्त हंसे, सबने डांटा भी कि सोशल सर्विस के कारण कॅरियर चौपट मत कर। लेकिन आज काजल शहर की मलिन बस्तियों में जाकर महिलाओं को मासिक स्वच्छता की जानकारी देती हैं। बच्चों को पढ़ाती हैं। 
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नम्रता - फोटो : अमर उजाला
बेसहारों को दिया आश्रय 
गंगानगर में श्री सांई सेवा संस्थान दादा, दादी निवास आश्रम की संचालिका नम्रता सिर्फ बेसहारा बुजुर्गों को नि:शुल्क सहारा ही नहीं देती, बल्कि उनका ख्याल भी रखती हैं। नम्रता और उसके पति ने मिलकर बुजुर्ग आश्रम खोला है। जहां बेसहारा वृद्धों को आश्रय दिया जाता है। समाज के सहयोग से आश्रम संचालित है। वह कहती हैं कि समाज के सहयोग और कुछ अपने खर्च से काम चल जाता है। 
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आस्था - फोटो : अमर उजाला
ताकि उनकी भी दिवाली हो सके
किसी का घर हजार दीपकों, झालरों की रोशनी से जगमग है तो किसी के घर भले एक दीपक जले, लेकिन अंधेरा तो न हो। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मजबूरों की सहायता कर रही हैं आस्था। परिंदे संस्था से जुड़ी आस्था दोस्तों के साथ मिलकर लोगों से पुराना सामान जोड़ती हैं। वह कहती हैं कि हम डोर टू डोर जाकर सामान, कपड़े, किताबें, खिलौने जुटाते हैं। सब ताने मारते हैं, लेकिन हमें जरूरतमंदों को सामान बांटने पर सुकून मिलता है। 
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गीता - फोटो : अमर उजाला
दायमपुर निवासी गीता ने अपने सम्मान की खातिर न सिर्फ खर्चों से समझौता किया। गीता कहती है कि पति की आय में शौचालय बनवाना संभव नहीं था। दस हजार का खर्चा होना था किसी तरह कपड़े सिले, काम किया, पैसा जोड़ा। आज गीता के घर में शौचालय है।

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