23 मई 1987, जगह-मेरठ, समय-दोपहर के करीब दो बजे थे। चारों तरफ चीख-पुकार मची थी। हर तरफ गोलीबारी हो रही थी, घर के पास दंगाई आ गए तो परिवार के सदस्य यहां से निकलकर थोड़ी दूर जाकर छिप गए। कुछ दंगाई अंधाधुंध फायरिंग कर रहे थे। एकाएक उन्होंने एक मकान में आग लगा दी। वह मंजर दिल दहलाने वाला था।
आशियाना आंखों के सामने ही जलता रहा, मगर वह बेबस रहे। परिवार ने किसी तरह भागकर जान बचाई। यह दास्तां सुनाते हुए दंगा पीड़ित मोहम्मद शरीफ उर्फ भूरे की आंख भर आई। उन्होंने बताया कि आशियाना तो खाक हो गया, लेकिन गनीमत रही कि परिवार के सदस्य बच गए। सेना के आने के बाद वह जल चुके मकान में पहुंचे। यहां सिर्फ राख ही थी, यह दिन वह कभी नहीं भूल पाए।
मोहम्मद शरीफ ने बताया कि लंबे संघर्ष के बाद दोबारा आशियाना तैयार किया, लेकिन इस दंगे में आशियाना खोने वाले वह इकलौते नहीं थे। उनकी तरह चमन और नौशाद अली के आशियाने भी दंगे में जल गए थे। उस समय नौशाद की उम्र 15 साल ही थी। मलियाना दंगे को भले ही करीब 36 साल हो गए हों, लेकिन कुछ परिवारों के लिए यह दंगा अभिशाप बन गया। ये परिवार इसे अब तक नहीं भूल पाए हैं।