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18 गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट ने 'जय बद्री विशाल' के साथ पूरे किए 34 बरस 

Mon, 11 Feb 2019 05:04 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
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18 गढ़वाल रेजीमेंट
शेर की दहाड़ और पहाड़ियों पर मिनटों में चढ़कर दुश्मन को चित करने की महारत हासिल करने वाली सेना की 18 गढ़वाल रेजीमेंट ने 34 वी वर्षगांठ मनाई। मेरठ केंट स्थित रेजीमेंट स्थल पर शहीदो को पुष्प चक्र अर्पित करने के बाद वीर नारियों और वेटरन्स का सम्मान किया गया। इस मौके पर रेजीमेंट के रिटायर्ड अधिकारी भी मौज़ूद रहे।

कार्यक्रम की शुरुआत सबसे पहले कर्नल(रिटायर्ड) जेके शर्मा ने शहीदो को पुष्पचक्र अर्पित कर की। इसके बाद पाइप बेंड के द्वारा शहीदो को सलामी दी गई। वहीं, पूर्व सैन्य अधिकारियों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए।
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18 गढ़वाल रेजीमेंट
द्रास सेक्टर में रही अहम भूमिका
द्रास सेक्टर की चोटियां दुश्मन से खाली करवाने में इस रेजीमेंट की अहम भूमिका रही। इसे कब्जा करने में सपूतों ने प्राण न्यौछावर किये। मई 1999 में भारत सरकार को जम्मू और कश्मीर के कारगिल क्षे़त्र में पाकिस्तानियों द्वारा घुसपैठ की खबर मिली।
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18 गढ़वाल रेजीमेंट
दुश्मन के मसूबों को नाकाम करने के लिये भारतीय सैना ने ऑपरेशन विजय के तहत सैनिक कार्रवाई प्रारंभ की। इसी दौरान 18 गढ़वाल राइफल्स को कारगिल के द्रास सैक्टर में दुश्मन पर फतह के लिए भेजा गया। राइफल्स के वीर सैनिको ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए द्रास सेक्टर की दुर्गम चोटियों पर कब्जा कर लिया। 
 

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18 गढ़वाल रेजीमेंट
स्वर्ण अक्षरों में इन शहीदो के नाम
कैप्टन सुमित रॉय, सीएचएम कृपाल सिंह, हवलदार जगत सिंह, हलवदार पदम राम, लांस नायक शंकर राजा राम शिंदे, नायक भारत सिंह, नायक कशमीर सिंह, नायक मंगत सिंह, नायक राकेश सिंह, राइफल मैन अनुसूइया प्रसाद, राइफलमैन डबल सिंह ने देश की रक्षा करते हुए वीरगति पाई।
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यह है इतिहास
15 फरवरी 1985 में गठन के बाद से 18 गढ़वाल राइफल्स ने सभी महत्वपूर्ण ऑपरेशनों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। साल 2000 में 18 गढ़वाल राइफल्स ने स्थापना दिवस कर रजत जयंती समारोह मनाया। इससे पूर्व बटालियन अक्टूबर 1987 से दिसंबर 1989 तक श्रीलंका के ऑपरेशन पवन में शामिल थी।
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18 गढ़वाल रेजीमेंट
नवंबर 1991 से अप्रैल 1992 तक पंजाब के ऑपरेशन रक्षक में, मार्च 1993 से अगस्त 1993 तक सियाचिन के ऑपरेशन मेघदूत में, दिसंबर 1997 से दिसंबर 1999 तक जम्मू-कश्रीर के ऑपरेशन रक्षक में, मई-जुलाई 1999 तक कारगिल के ऑपरेशन विजय में, जुलाई 2003 से जुलाई 2005 तक तवांग के ऑपरेशन फाल्कन में और जुलाई 2005 से अगस्त 2006 तक मणिपुर के ऑपरेशन हिफाजत में अभूतपूर्व योगदान दिया।

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