एक जुलाई 1895 में जन्मे हरिवंश राय का बचपन भी संघर्षों के बीच गुजरा। उनके पौत्र अजय राय बताते हैं, जीवन के अंतिम दौर में बाबा ने कुछ किस्से साझा किए थे। बाबा ने बताया था कि अंग्रेजों से ताल्लुक रखने वाले एक लाला जी ने फर्जी दस्तावेज के सहारे गांव की तीन हिस्से की जमीन हड़प ली। पैरवी के लिए रुपये नहीं थे। बाबा के पिता सरयू राय ने अपनी जमीन को बंधक रखकर रुपये जुटाए और मुकदमा लड़ा।
बांसगांव तहसील से करीब 12 किमी दूरी पर एक गांव है केशवापार, चाड़ी। गांव तक पहुंचने के लिए टेढ़े-मेढ़े तंग रास्ते हैं। इसी गांव के रहने वाले हैं स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सिंगापुर में आजाद हिंद फौज में शामिल रहे हरिवंश राय। कई लोगों से पूछने पर उनके घर का पता चला, जबकि जंगे आजादी के समय बच्चा-बच्चा की जुबान पर उनका नाम हुआ करता था।
गांव में उनके नाम पर न तो प्रवेश द्वार है और न ही उनकी निशानी। उनके पौत्र ने घर की आलमारी में कुछ धुंधली तस्वीर, ताम्रपत्र और पेंशन के कुछ दस्तावेज निशानी के तौर पर सहेज कर रखा है। गांव वालों से जब आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभाने वाले हरिवंश राय के घर तक पहुंचने के लिए गांव वालों से रास्ता पूछा गया तो उनके चेहरे पर कई सवाल तैरने लगे।
उनकी चिंता भी वाजिब थी क्योंकि उनके यहां आज तक न तो कोई सरकारी महकमे से कोई पहुंचा था और न ही उनके निधन पर राजकीय सम्मान मिला। कार्यक्रमों में भी परिवार के लोगों को पूछा नहीं जाता।
घर पर उनके पौत्र अजय मिले, पहले तो उन्होंने हैरत भरी नजरों से देखा फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो हरिवंश राय से जुड़े जो कागजात सजों कर रखे थे उसे लाकर रख दिया। गहरी सांस लेते हुए बोले, जब बाबा जिंदा थे उनसे मिलने आसपास के कुछ स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े लोग आते थे। कई साल बाद उन्हें पूछते आप आए हैं।
गांव की जमीन हड़प ली लाला जी ने...मुकदमे की पैरवी के लिए बंधक रखा खेत
एक जुलाई 1895 में जन्मे हरिवंश राय का बचपन भी संघर्षों के बीच गुजरा। अजय राय बताते हैं, जीवन के अंतिम दौर में बाबा ने कुछ किस्से साझा किए थे। बाबा ने बताया था कि अंग्रेजों से ताल्लुक रखने वाले एक लाला जी ने फर्जी दस्तावेज के सहारे गांव की तीन हिस्से की जमीन हड़प ली। पैरवी के लिए रुपये नहीं थे। बाबा के पिता सरयू राय ने अपनी जमीन को बंधक रखकर रुपये जुटाए और मुकदमा लड़ा।
इस दौरान घर की माली हालत बहुत ही खराब हो गई। 1934 में गांव के कुछ लोगों के साथ बाबा सिंगापुर चले गए और वहां जेल गार्ड की नौकरी मिल गई। भतीजे कमलाकांत को भी बुला लिया। आठ साल तक नौकरी की, इसी बीच आजाद हिंद फौज का गठन हो रहा था।
सुभाष चंद बोस सिंगापुर में एक कैंप में लोगों को संबोधित कर रहे थे, उनसे प्रेरित होकर जेल गार्ड की नौकरी छोड़ी आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। आंदोलन के मुख्य रणनीतिकारों में शामिल होकर सिंगापुर में लोगों से संपर्क कर मूवमेंट से जोड़ा और कैंप में ट्रेनिंग ले रहे लड़ाकों के खर्च के लिए रकम जुटानी शुरू की।
1945 में नेताजी सुभाष चंद बोस के निधन की सूचना मिलने के बाद हरिवंश राय सिंगापुर में भूमिगत हो गए। 1950 में भारत आए। यहां भी सामाजिक कार्यों में लगे रहे।
300 एकड़ गांव वालों को दिलाई जमीन
हरिवंश राय ने सिंगापुर में नौकरी के दौरान जुटाई गई रकम को घर भेजा और बंधक रखा खेत छुड़वाया। फिर बढि़या वकील रखकर मुकदमा की पैरवी कराई और जीते भी। गांव में करीब 300 एकड़ जमीन के कागजात पर फिर से लोगों का नाम चढ़ा।
सालता है दर्द...अंतिम संस्कार में नहीं मिला गाॅर्ड ऑफ ऑनर
करीब 110 साल की उम्र में छह मई 1999 में उन्होंने अंतिम सांस ली। गांव वालों को आज भी यह दर्द सालता है कि निधन के बाद हरिवंश राय को सम्मान के तौर पर गार्ड ऑफ ऑनर तक नहीं दिया गया। गांव के प्रधान प्रतिनिधि प्रवीण राय बताते हैं, अंतिम संस्कार में आसपास गांवों के लोग जुटे पर पुलिस-प्रशासन की ओर से कोई नहीं आया और न ही पुलिस द्वारा गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।