घरेलू गौरैया से हम सभी परिचित हैं। बचपन से अपने आंगन में फुदकती गौरैया को देखकर नैसर्गिक आनंद प्राप्त होता था। सूचना क्रांति के इस युग में हमारे बच्चे उससे वंचित होते जा रहे हैं। गौरैया की प्रजाति लगभग 90 प्रतिशत विलुप्त हो चुकी है। हमारे घर-आंगन से गौरैया के विलुप्त होने के हम भी बराबर के दोषी हैं। जानें कैसे कर सकते हैं नन्ही चिड़िया गौरैया का संरक्षण...
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गौरैया संरक्षण के लिए शुरू किया गया अभियान
नन्ही चिड़िया गौरैया के संरक्षण के लिए कानपुर शहर से एक अभियान शुरू किया गया। जिसका नाम स्वीट स्पैरो कम बैक होम रखा गया। अभियान की शुरुआत सितंबर 2014 में की गयी। अभियान संयोजक गौरव बाजपेई ने बताया कि अब तक लगभग 80 स्कूल, कॉलेजों ने गौरैया के संरक्षण की मुहिम में हिस्सा लिया है। इस मुहिम से जुड़ने वाले छात्र छात्राओं की संख्या 50000 के करीब है। इस अभियान के तहत 5000 घोसले कानपुर व अन्य शहरों में लगवाए गएं हैं। मुहिम से कानपुर के अलावा कानपुर देहात, भोपाल, उन्नाव, तमिलनाडु, दिल्ली, हरियाणा भी जुड़ चुका है।
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गौरैया के लिए लगाएं घरौंदे
गौरैया के ये लकड़ी के घोसले, गौरैया के अंडे और छोटे बच्चों को ऊंचाई से गिरने से बचा लेते हैं। ऊंचाई से असुरक्षित जगह से गिर जाने के कारण गौरैया के 70% तक अंडे टूट जाते हैं और फिर बच्चे गिर कर मर जाते हैं, जो कि इन घोसलों के कारण बच रहे हैं।
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पहले झुण्ड में पायी जाती थी गौरैया
20 वर्ष पहले तक गौरैया 200- 400 तक के झुंडों में पाई जाती थी। पुराने मकानों में मुकवे और मोटी दिवालो के कारण इन्हें आसानी से घोसले बनाने की जगह मिल जाती थी।
अब दीवालें 5 इंच की बनती है और उसमे ऊपर से प्लास्टर भी होता है इस वजह से दिवालों में घोसला बनाने की संभावना खत्म हो जाती है। इस कारण से दुनिया की एक मात्र घरेलू चिड़िया ने घरों में घुस कर तस्वीर के पीछे, सीलिंग फैन के ऊपर बने कप में, मीटर बॉक्स में घोसले बनाना शुरू किया। जहाँ से इनके अधिकतर अंडे और बच्चे गिर कर मरने लगे।
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घने पेड़ जरूर लगाएं
गौरैया व अन्य सभी चिड़ियों, गिरगिट, गिलहरियों को खुद को और अपने बच्चों को छिपाने के लिए पेड़ों की जरूरत होती ही है नहीं तो बाज, बिल्ली, कौवे इन्हें या इनके बच्चों को शिकार बना लेते हैं। गौरैया पेड़ों पर अक्सर घोसले नहीं बनाती सिर्फ अपने और अपने बच्चों को छिपाने के लिए उसे कनेर, अनार, बोगन बेलिया, शमी, मालती की बेल, बेर, नींबू, शहतूत, करेन्डोला, फाइकस, मनोकामिनी जैसे घने कांटेदार झाड़ों की जरूरत होती है। अन्य छोटी चिड़ियों उनके बच्चों के लिए भी यही पेड़ उन्हें सुरक्षा प्रदान करते हैं।
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पेड़ों की संख्या कम होना भी बड़ा कारण
लोग पेड़ों को खूबसूरत बनाने के लिए उनकी अनावश्यक छटाई करवा देते हैं। जबकी पेंडो की छटाई सिर्फ बारिश से पहले होनी चाहिए ताकि बारिश की ताकत पाकर वो 3-4 महीनों में अपनी पुरानी स्थिति में आ जाये। पूरे साल पार्को में छटाई का कार्य चलता है और पेड़ों की छटाई के नाम पर कई बार उनकी हरियाली को 80- 100% तक समाप्त कर दिया जाता है। पेड़ के नाम पर बस एक डंडा या तना बचता है और उसपर रहने वाले सभी छोटे बड़े जीव-जंतुओं का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। क्योंकि अक्सर पूरे पार्क में एक साथ छटाई की जाती है।
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चिड़ियों को दाना पानी डालना अपनी दिनचर्या में करें शामिल
पनकी क्षेत्र निवासी बाल कल्याण समिति सदस्य श्रृद्धा कुलश्रेष्ठ बताती हैं कि उन्होंने अपने घर में गौरैया के लिए 6 घोसले लगाएं हैं। सभी में गैरैया का पेयर रहता है। साथ ही उन्हें सुबह-शाम दाना-पानी देना अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया है। कुछ में तो गौरैया ने बच्चे भी पैदा किए हैं। नन्हें-नन्हें बच्चे दिनभर चहचहाते हैं जिससे पूरा घर उनकी चहचाहट से गूंज उठता है। रात में गौरैया को दाना-पानी देने के बाद ही पूरा घर खाना खाता है।
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विलुप्त होने के कारण
- प्राकृतवास का खत्म होना गौरैया के विलुप्त होने के एक बड़ा कारण है।
- सुपरमार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दुकानें घट रही हैं, इससे गौरैया को दाना नहीं मिल पाता है।
- मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगे भी गौरैया को नुकसान पहुंचाती हैं।
- ज्यादा तापमान व लगातार बढ़ रहे प्रदूषण के कारण भी इनकी संख्या कम हो रही है।
- खेती में कीट-नाशकों का प्रयोग होने से कीड़े - मकोड़ों का खत्म होना भी इनके विलुप्त होने का बड़ा कारण है।
संरक्षण के उपाय
- घरों के आस-पास उनके लिए घोसला बनाएं। साथ ही दाना-पानी की भी व्यवस्था करें।
- खेती में रासायनिक कीट-नाशकों के प्रयोग पर रोक लगायी जाए तथा जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाए।
- प्रदूषण को नियंत्रित किया जाए।
- मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों को रोकने के लिए विशेष उपकरणों का प्रयोग किया जाए।