यूपी में अपनी खोई हुई ताकत और सत्ता को वापस पाने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेताओं ने तो हाथ मिलाया लेकिन दोनों पार्टियों के कभी दिल नहीं मिले। अखिलेश ने तो चुनाव के नतीजे आने से पहले ही यूपी में भाजपा को हारी हुई पार्टी घोषित कर दिया था लेकिन जब 23 मई को नतीजे आना शुरु हुए तो सपा बसपा एक के बाद एक सीटें हारते गए।
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डिंपल यादव, अखिलेश यादव, मायावती
- फोटो : गूगल
एक एक कर सपा बसपा के गढ़ों को भाजपा के रणबांकुरों ने रौंद कर रख दिया। यूपी की कन्नौज, फर्रूखाबाद, इटावा, फतेहपुर, हरदोई, उन्नाव, कानपुर, अकबरपुर, हमीरपुर, बांदा चित्रकूट सभी सीटों पर भाजपा ने प्रचंड मतों से जीत हासिल की। डिंपल यादव के मायावती के पैर छूने का भी सपा की हार पर असर पड़ा।
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जब डिंपल ने मायावती के पैर छुए थे तो अखिलेश खड़े होकर मुस्कुरा रहे थे
- फोटो : अमर उजाला
वहीं मायवती ने कई रैलियों में सपा के कार्यकर्ताओं पर खूब तंज भी कसे। जो कहीं न कहीं इस हार का कारण बने। संसदीय क्षेत्र चित्रकूट बांदा सीट पर सपा की हार का कारण सपा व बसपा के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं के बीच सही तालमेल न होने व चुनाव के समय पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की सभा न होना भी बताया जा रहा है।
संसदीय क्षेत्र चित्रकूट बांदा बसपा पार्टी का गढ़ माना जाता रहा है। एक समय इस क्षेत्र से प्रदेश सरकार में तीन से चार विधायक बसपा सरकार में रहा करते रहे थे। पिछले लोकसभा के चुनाव में दूसरे नंबर पर इस सीट से बसपा का प्रत्याशी था। इसके बाद भी गठबंधन होने पर सपा को यहां से सीट दे दी गई थी।
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अखिलेश और मायावती की आजमगढ़ में संयुक्त रैली
- फोटो : Twitter
जिससे अंदर अंदर बसपा के कार्यकर्ता नाराज थे। बसपा का प्रत्याशी न होने के कारण बसपा के कार्यकर्ताओं ने अधिक जोर भी नहीं लगाया। चुनाव के समय कई कार्यकर्ता मन से प्रचार नहीं किया। इसके अलावा बसपा के कई कद्दावर नेता चुनाव के समय क्षेत्र में प्रचार करने के लिए नहीं निकले जिसका परिणाम यह रहा कि यहां से सपा का प्रत्याशी चुनाव हार गया।
बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती भी चुनाव के दौरान सभा करने नहीं आयी। जिसका बड़ा असर देखने को मिला। कहा जा रहा है कि यदि बसपा के कार्यकर्ता पूरे मन से साथ देते तो सपा की जीत हो सकती थी। परिणाम आने के बाद सपा सहित बसपा के पदाधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं।