बंदी की कगार पर पहुंच चुके उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम को उसके अपने ही अधिकारी चूना लगा रहे हैं। सरकारी विभागों को मैनपॉवर (कर्मचारी) उपलब्ध कराने के लिए यूपीएसआईसी में पंजीकृत कुछ चहेते वेंडरों को लाभ पहुंचाने की नीयत से फर्जी अधिकार पत्र जारी कर दिए गए।
इन अधिकार पत्रों के जरिए वेंडरों ने यूपीएसआईसी के नियमों को ताक पर रखकर खूब मनमानी की। इसका परिणाम यूपीएसआईसी को कमीशन और तमाम तरह के टैक्स के नुकसान के रूप में सामने आया है।
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डेमाे पिक
उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम में हुए इस गड़बड़झाले को समझने के लिए विभाग की कार्यपद्धति समझनी होगी। दरअसल, यूपीएसआईसी सरकारी विभागों को संविदा पर अथवा ठेके पर कर्मचारी उपलब्ध करवाने के लिए प्रदेश सरकार की ओर से नोडल एजेंसी के तौर पर काम करता है। किसी विभाग को संविदा पर कर्मचारियों की जरूरत होती है तो वह यूपीएसआईसी को बताता है। यूपीएसआईसी अपने यहां पंजीकृत वेंडरों के जरिए कर्मचारियों की आपूर्ति करवाता है। इसके ई-टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जाती है। वर्ष 2014 में वेंडरों के पंजीकरण के आवेदन मांगे गए। इसमें से छह वेंडरों को तीन साल यानी 30 अक्तूबर 2017 तक के लिए पंजीकृत किया गया। अब गड़बड़ ये हुई कि यूपीएसआईसी के उप मुख्य प्रबंधक के हस्ताक्षर से इन वेंडरों को बिना प्रबंध निदेशक के अनुमोदन के अधिकार पत्र जारी कर दिए गए। इन अधिकार पत्रों में संबंधित वेंडरों को यूपीएसआईसी का प्रतिनिधित्व करना बताया गया, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। वर्ष 2015 और 16 में ऐसे 190 अधिकार पत्र जारी किए गए। इस गड़बड़झाले से न सिर्फ विभाग को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा बल्कि उसका अपना अस्तित्व भी खतरे में पड़ता दिखा।
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ऐसे हुआ नुकसान
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यूपीएसआईसी के सूत्र बताते हैं कि वेंडरों को अधिकार पत्र दिए जाने से उन्होंने मनमानी की। किस विभाग को कितने कर्मचारी उपलब्ध कराए इसकी सही जानकारी नहीं दी गई। कई वेंडर यूपीएसआईसी का कमीशन तक हड़प गए। उपलब्ध कराए गए कर्मचारियों की सही संख्या न आने पर विभिन्न विभागों का टैक्स भी मारा गया। इसके अलावा विभाग कर्मचारियों की आपूर्ति के लिए सीधे वेंडरों से संपर्क साधने लगे।
ये कहता है नियम
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जब कोई विभाग कर्मचारियों की मांग करता है तो संबंधित विभाग और यूपीएसआईसी के बीच अनुबंध पत्र साइन होता है। सभी संवाद और औपचारिकताएं यूपीएसआईसी की ओर से कराए जाने का प्रावधान है। यूपीएसआईसी को कर्मचारियों की आपूर्ति के लिए टेंडर निकालता होता है ताकि किसी एक को काम दिए जाने का आरोप न लगे। जिस वेंडर के नाम से टेंडर खुलता है, यूपीएसआईसी को उसे हर काम के लिए निर्देशित करना होता है न कि अधिकार पत्र जारी करके उसे सर्वेसर्वा बनाया जाता है।
वर्जन
फर्जी अधिकार पत्र जारी किए जाने का मामला संज्ञान में आया है। इसकी फाइल तलब की गई है। इसकी विस्तृत जांच होगी। देखा जाएगा किस वेंडर ने किस तरह से नुकसान पहुंचाया। जहां कहीं भी गड़बड़ी मिली, उस पर कार्रवाई होना तय है। हीरा लाल, प्रबंध निदेशक, यूपीएसआईसी