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शायद आप भी नहीं जानते होंगे होली से जुड़ी ये 10 बड़ी बातें

Tue, 14 Mar 2017 10:49 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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होली
जीवन की नीरसता को दूर करने वाला होली का त्योहार आखिर क्यों मनाया जाता है। इसके बारे में शायद कम ही लोग जानते होंगे। होली को मनाने की परंपरा कब शुरू हुई इसके पीछे के जो कारण हैं, उनसे जुड़ी कहानियां सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। आज हम आपको बताते हैं हैं होली के त्योहार से जुड़ी कुछ रोचक कथाएं...
 
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शायद आप भी नहीं जानते होंगे होली से जुड़ी ये 10 बड़ी बातें

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होली
होली के पर्व की कथाएं तो अनेक हैं लेकिन जो सबसे प्रचलित कथा है वह है भक्त प्रह्लाद की। प्रह्लाद का पापी पिता हिरण्यकश्यप खुद को भगवान कहता था लेकिन प्रह्लाद को भगवान विष्णु में अटूट श्रद्धा थी। इसी वजह से वह अपने बेटो को मारना चाहता था। हिरण्यकश्यप की बहन जिसका नाम होलिका था उसके पास एक चद्दरनुमा वस्त्र या कवच था जिसे ओढ़ने के बाद उसे अग्नि जला नहीं सकती थी।
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होली
अब यह तय हुआ कि होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठेगी व वह अग्नि में समाप्त हो जायेगा। लेकिन यहां भी भगवान ने उसका साथ दिया और जैसे ही आंच प्रह्लाद तक पंहुची बड़े जोर का तूफान आया और होलिका के कवच ने प्रह्लाद को ढक लिया व होलिका अग्नि में भस्म हो गई इस प्रकार होली का यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। 

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डेमो पिक
कहते हैं राजा पृथु के राज्यकाल में ढुंढी नाम की एक बहुत की ताकतवर व चालाक राक्षसी थी, वह इतनी निर्मम थी की बच्चों तक को खा जाती। उसने देवताओं की तपस्या कर यह वरदान भी प्राप्त किया था कि उसे को देव, मानव, अस्त्र-शस्त्र नहीं मार सकेगा और न ही उस पर गर्मी, सर्दी व वर्षा आदि का कोई असर होगा। इसके बाद तो उसने अपने अत्याचार और भी बढ़ा दिये। किसी को भी उसका वध करने में सफलता नहीं मिल रही थी। सभी उससे तंग आ चुके थे। लेकिन ढुंढी भगवान शिव के शाप से भी पीड़ित थी। इसके अनुसार बच्चे अपनी शरारतों से उसे खदेड़ सकते थे उसका वध भी कर सकते थे।

 
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डेमो पिक
जब राजा पृथु ने राज पुरोहितों से कोई उपाय पूछा तो उन्होंने फाल्गुन पूर्णिमा के दिन का चयन किया क्योंकि यह समय न गर्मी का होता है न सर्दी का और न ही बारिश का। उन्होंने कहा कि बच्चों को एकत्रित होने को कहें। आते समय अपने साथ वे एक-एक लकड़ी भी लेकर आयें। फिर घास-फूस और लकड़ियों को इकट्ठा कर ऊंचे ऊंचे स्वर में मंत्रोच्चारण करते हुए अग्नि की प्रदक्षिणा करें।
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डेमो पिक
इस तरह जोर-जोर हंसने, गाने व चिल्लाने से पैदा होने वाले शोर से राक्षसी की मौत हो सकती है। पुरोहित के कहे अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन वैसा ही किया गया। इस प्रकार बच्चों ने मिल-जुल कर धमाचौकड़ी मचाते हुए ढुंढी के अत्याचार से मुक्ति दिलाई। मान्यता है कि आज भी होली के दिन बच्चों द्वारा शोरगुल करने, गाने बजाने के पीछे ढुंढी से मुक्ति दिलाने वाली कथा की मान्यता है। 
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होली का त्यौहार मनाने का संबंध भगवान शिव व माता पार्वती की एक कथा से भी जुड़ा है। कथा कुछ यूं है कि माता पार्वती जो कि हिमालय की पुत्री थी वे भगवान भोलेनाथ को चाहने लगती हैं और उनसे विवाह करना चाहती हैं। वहीं भगवान भोलेनाथ हमेशा तपस्या में लीन रहने वाले। ऐसे में माता पार्वती के लिये भगवान शिव के प्रति अपने प्रेम का इजहार करना और उनके समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखना बहुत मुश्किल हो रहा था। तब उनकी सहायता के लिये कामदेव आते हैं और पुष्प बाण के जरिये भगवान शिवशंकर की तपस्या को भंग कर देते हैं।

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भगवान भोलेनाथ की तपस्या भंग करने का परिणाम शायद वे जानते नहीं थे, जैसे ही भगवान भोलेनाथ की आंखे खुली उन्हें कामदेव की इस हरकत पर बहुत अधिक क्रोध आया व अपने तीसरे नेत्र से उन्हें भस्म कर दिया लेकिन जैसे ही माता पार्वती सामने आयी उनका क्रोध कुछ शांत हुआ माता पार्वती के प्रस्ताव को उन्होंने स्वीकार कर लिया। माना जाता है कि होली के त्यौहार पर अपनी कामवासना को अग्नि में जलाकर निष्काम भाव के प्रेम की विजय का उत्सव मनाया जाता है।

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हालांकि इसी कथा को थोड़ा दूसरे नजरिये से भी प्रस्तुत किया जाता है जिसके अनुसार कामदेव के भस्म होने पर उनकी पत्नी रति भोलेनाथ की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करती हैं और कामदेव को जीवित करने की प्रार्थना करती हैं। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भोलेनाथ कामदेव को जीवित कर देते हैं। जिस दिन यह सब हुआ वह दिन फाल्गुन मास की पूर्णिमा यानि की होली का दिन माना जाता है।

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डेमो पिक
लोक गीतों में तो रति विलाप के गीत भी मिलते हैं व अग्निदान में चंदन की लकड़ी दी जाती है ताकि कामदेव को जलने में होने वाली पीड़ा से मुक्ति मिले। मान्यता है कि कामदेव के पुन: जीवित होने की खुशी में अगले दिन रंगों वाली होली मनाई जाती है। 

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राक्षसी पूतना के वध की कथा भी होली के इस पर्व से जोड़ी जाती है। कहते हैं जब कंस के लिये यह आकाशवाणी हुई कि गोकुल में उसे मारने वाले ने जन्म ले लिया है तो कंस ने उस दिन पैदा हुए सारे शीशुओं को मरवाने का निर्णय लिया। इस काम के लिये उसने पुतना राक्षसी को चुना।
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डेमो पिक
पूतना बच्चों को स्तनपान करवाती जिसके बाद वे मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे लेकिन जब उसने श्री कृष्ण को मारने का प्रयास किया तो श्री कृष्ण ने पूतना का वध कर दिया। यह सब भी फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हुआ माना जाता है जिसकी खुशी में भी होली का पर्व मनाया जाता है।
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