कोरोना का कहर थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। वहीं लॉकडाउन से लेकर अनलॉक तक लगभग सभी व्यवस्थाएं चौपट हो गईं हैं। पांच महीने बाद भी चीजें पटरी पर नहीं आ पाई हैं। जानिए कानपुर के आसपास के जिलों का हाल...
धीरे-धीरे ही सही पटरी पर आ जाएगा अपना शहर
हरदोई जिले में मार्च माह में हुए लॉकडाउन के बाद से शहर को ऐसी नजर लगी कि पूरे पांच माह गुजर जाने के बाद भी शहर की गाड़ी अपनी पुरानी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। स्कूल कॉलेज आज भी बच्चों को तरस रहे हैं तो व्यापारी ग्राहकों को।
फिर भी सतर्कता अपनाकर अपने को व अपनों को बचाकर लोग आगे बढ़ते जा रहे हैं। सोमवार को शहर के कुछ हिस्सों को कैमरे में कैद करके और उन्हीं हिस्सों की तस्वीरें जो मार्च में ली गईं थीं उनको एक साथ दिखाने का प्रयास किया गया है।
बिना काम घर से बाहर नहीं निकलते लोग
मार्च माह से लेकर अगस्त तक कोरोना संक्रमण ने लोगों को इतना कुछ सिखा दिया कि लोगों ने कहीं न कहीं अपनी जीवन शैली को भी बदल दिया है। सड़कों का नजारा अपने आप स्वयं बोल रहा है कि अब यहां बिना काम के कोई नहीं टहल रहा है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
मार्च से पहले तो इतना साफ चौराहा हमने तो न देखा..
शहर के व्यस्ततम चौराहे में से एक शहर का नुमाइश चौराहे को शायद ही दिन में कभी किसी ने खाली देखा हो। पर मार्च के बाद से अब तक हालातों से ऐसा कुछ सिखा दिया कि घरों में लोगों की भीड़ तो चौराहे तन्हा दिखाई देते हैं।
कोरोना ने तो भगवान से भी बना दी दूरी
कोरोना काल ने भगवान से लोगों की ऐसी दूरी बनाई कि अब तो भगवान के द्वार पर भी लोग कुछ न कुछ सोच के ही जाते हैं अन्यथा घरों में ही पूजन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह कि श्रद्धालुओं में ईश्वर के प्रति श्रद्धा नहीं कम हुई पर हां मार्च के पहले मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ और इन दिनों मंदिरों में चहल पहल में काफी अंतर आ गया है।
सरकारी कार्यो ने भी बदल दिया अपना ढर्रा
कोरोना संक्रमण काल में सरकारी दफ्तरों में कार्यो का ऐसा ढर्रा बदला कि मार्च के पहले और अब के सरकारी कार्यालयों में काफी कुछ बदला बदला नजर आने लगा है। प्रत्यक्ष उदाहरण समाज कल्याण विभाग कार्यालय ही है। जहां मार्च तक जहां लोग अंदर घुसकर काउंटर तक भीड़ लगा लेते थे लेकिन अब आलम यह है कि उसी कार्यालय के गेट पर ही जरूरतमंदों को रोक लिया जाता है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
हां निश्चित रूप से व्यवसाय में आई है कमी
कोरोना संक्रमण काल ने निश्चित रूप से व्यवसाइयों पर भी काफी असर डाला है। बाजार खुल तो जरूर रहे हैं लेकिन वह बात नजर नहीं आ रही है। दुकान, शोरूम, होटल , रेस्टोरेंट कोई भी क्यों न हो पर हालत व्यवसाय के अभी सुधरे नहीं हैं।
कोरोना ने छीनीं खुशियां, रोजगार गंवाया, रोटी के लाले
हमीरपुर में कोरोना ने खाते-पीते, खुशहाल परिवारों को परेशानियों के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। रोजगार गंवाने वाले तमाम प्रवासियों के हालात ठीक नहीं हैं। परदेश में अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने वाले कई प्रवासी जिले में आकर उनका दाखिला तक नहीं करा पाए हैं। कुछ ने हालात भांपकर गांव के सरकारी स्कूलों में प्रवेश दिलाया है। परदेश में अच्छा खासा कमाने वाले तमाम प्रवासियों के जीवन स्तर पर कोरोना का ग्रहण क्या लगा, छोटी-छोटी खुशियां तक इनसे रूठ गईं हैं। अपनी जरूरतों में कटौती करते हुए ये किसी तरह परिवार चला रहे हैं।
महामारी ने छीनी बच्चों की पढ़ाई
सूरत में एक धागा फैक्टरी में पत्नी के साथ काम करने वाले कीरतपुर गांव निवासी गुलबदन निषाद ने बताया दोनों लोग मिलकर करीब बीस हजार रुपये से अधिक प्रति माह कमा लेते थे। लॉकडाउन में मई माह में गांव आ गए। तबसे वह बेरोजगार हैं। बीते माह मनरेगा में काम कर परिवार का खर्चा चलाया। अब बेतवा नदी में मछली का आखेट कर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। सूरत में तीनों बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ाते थे, मगर अब आर्थिक समस्या के कारण बच्चों को सरकारी स्कूल में भी प्रवेश नहीं करा पाए हैं। जब सूरत में फैक्टरी के ठेकेदार से बात हुई तो बताया कोरोना महामारी का असर कम नहीं हुआ है। अभी सूरत नहीं आना। बताया इस महामारी ने बर्बाद कर दिया है। अब आने वाले समय में दो वक्त की रोटी की चिंता है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
मकान मालिक मांग रहा किराया
अहमदाबाद में 10 साल से अपने परिवार के साथ रहकर कपड़ा कंपनी में हेल्पर का काम करने वाले पौथिया गांव निवासी गुरुशरण कोरोना महामारी के कारण अप्रैल में परिवार को लेकर गांव आए थे। तबसे बेरोजगार हैं। उन्होंने बताया सारे सपने बिखर गए हैं। दिन प्रतिदिन मरीजों की संख्या बढ़ने से वापस नहीं जा पा रहे हैं। अहमदाबाद के विवेकानंद इंग्लिश मीडियम में बेटा निखिल कक्षा चार में पड़ता है, जिसकी पढ़ाई बर्बाद हो रही है। बताया वहां रानीपुर पटिया में हर माह कमरे का किराया दो हजार रुपया देना है। गृहस्थी का सामान वहीं रखा है। मकान मालिक कई बार फोन पर किराया भेजने की बात कह चुका है। मगर काम बंद होने पर क्या करें। यहां भी बेरोजगार घूम रहे हैं। बताया पता नहीं कब इस महामारी से निजात मिलेगी। अब तो आने वाले समय की चिंता है।
कोरोना ने छीनीं खुशियां, रोजगार गंवाया, रोटी के लाले
तेलंगाना के बारंगल शहर में करीब 10 साल से पानी पूड़ी का धंधा कर परिवार चलाने वाले पौथिया निवासी गंगा प्रसाद कुशवाहा इन दिनों बेहद परेशान है। बताया कोरोना के कारण पूरा परिवार बिखर गया है। बताया छह माह से धंधा बंद है। 16 अप्रैल को परिवार सहित गांव आए थे, तब से बेरोजगार हैं। बच्चों की शिक्षा चौपट हो रही है। बारंगल के हन्नम कुंडा नगर में परिवार को रखे थे। बेटी प्रिया कक्षा 6 में और बेटा रिशांनक कक्षा पांच में पढ़ता था। मगर कोरोना के कारण वहां नहीं जा पा रहे हैं। बताया बच्चों की टीसी कट गई होती तो यहीं गांव में सरकारी स्कूल में नाम लिखवा देते। उधर मकान मालिक किराया भी मांग रहा है। वहां से स्कूल वाले भी फीस के लिए फोन कर रहे हैं कि फीस भेज दें नहीं तो बच्चों का नाम काट दिया जाएगा। अब तो सिर्फ परेशानी ही है।