समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव के नई पार्टी के गठन के एलान ने प्रदेश की सियासत में हलचल पैदा कर दी। उनके अगले कदम से समाजवादी पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती है। क्योंकि शिवपाल का इटावा समेत आसपास के जिलों की सियासत में गहरा प्रभाव है। माना जा रहा है इसका शिवपाल के सपा से हटने का असर आगमी लोकसभा में देखने को मिलेगा।
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शिवपाल सिंह यादव
22 सालों से जसवंतनगर सीट से चुनाव जीतते आ रहे शिवपाल सिंह का इटावा,मैनपुरी,कन्नौज, फर्रुखाबाद,फिरोजाबाद, शिकोहाबाद, कानपुर देहात समेत पूर्वान्चल की यादव बाहुल्य सीटों पर अच्छा प्रभाव है। सहकारी समितियों के चुनाव से लेकर ग्राम पंचायत ,निकाय से लेकर,विधानसभा और लोकसभा चुनाव में उसकी सक्रि यता रहती है। इसकी वजह से उनके समर्थकों की लम्बी फेरिस्त है। जोकि सपा के लिए मुफीद वोट बैंक का काम करते थे। साथ ही पार्टी के संघर्ष में शिवपाल के समर्थक ही सबसे आगे रहते थे।
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शिवपाल सिंह यादव
जब से सपा की बागडोर अखिलेश यादव के हाथ आयी। उसके बाद से शिवपाल पार्टी में काफी दिनों से उपेक्षा का शिकार थे। इसका दर्द भी उन्होंनेकई बार मंचों से साझा किया। उनके समर्थकों को पार्टी में तबज्जो नहीं मिल रही थी। इसको लेकर शिवपाल ने पार्टी छोड़ने और नई पार्टी गठन करने का निर्णय लिया। अब देखने वाली बात यह होगी कि शिवपाल सिंह यादव अपने इस मोर्चा को लेकर आगे क्या रणनीति अपनाते हैं और पार्टी को शिवपाल के हटने से कितना नुकसान और फायदा होगा। इसको लेकर अभी तक लोगों के मन में असमंजस की स्थिति है।
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शिवपाल सिंह यादव
सपा से नाराजगी का दे रहे थे संकेत
सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव लगातार अपनी नाराजगी का संकेत दे रहे थे। दो माह पहले अमर आशियाना में सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव का जन्मदिन मनाया गया। इस मौके पर शिवपाल सिंह भी पहुंचे थे और उन्होंने रामगोपाल को केक भी खिलाया। दोनों भाइयों के मिलने से संदेश गया कि समाजवादी पार्टी में सबकुछ ठीक चल रहा है, लेकिन कुछ देर बाद ही फिरोजाबाद की जनसभा में बैनर पर फोटो नहीं लगी होने पर शिवपाल सिंह ने नाराजगी जताई थी। बार-बार पार्टी में उपेक्षा का शिकार होने का दर्द वह अपने समर्थकों और रिश्तेदारों से जाहिर करते थे। साफ थी कि परिवार की खाई अभी भरी नहीं है। उनके इस निर्णय के बाद से परिवार के लोगों को भाैंचक्का कर दिया है।
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शिवपाल सिंह यादव
राजनीतिक मजबूरी, मुलायम सबके संग
भले ही लोग इसे राजनैतिक मजबूरी कहें, लेकिन आज राजनीतिज्ञ इसे जायज मानते हैं। मुलायम सिंह यादव आज अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव के लिए ऐसी ही राजनीतिक मजबूरी के उदाहरण बने हुए हैं। मुलायम सिंह यादव ने ही समाजवादी पार्टी को खड़ा किया और आज इसे इस मुकाम तक पहुंचाया है। यह मुलायम सिंह यादव की जमीनी पैठ का दर्शाता है। यहीं वजह है कि सपा के शीर्ष पर वर्चस्व को लेकर घमासान मचने के बाद भी मुलायम सिंह यादव को कोई नहीं छोड़ना चाहता।
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शिवपाल सिंह यादव
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन्हें जहां पार्टी संरक्षक के तौर पर सम्मान दिया हुआ है। अब शिवपाल सिंह यादव ने भी मुलायम सिंह यादव का ही नाम लेकर उन्हें आधार स्तंभ के तौर पर सामने रख रहे हैं। वह हमेशा ही यह कहते रहे हैं कि नेताजी (मुलायम सिंह यादव) की मर्जी के बगैर वह कोई कदम नहीं उठाएंगे। जबकि यह बात जाहिर है कि समाजवादी पार्टी में खुद की अनदेखी ही इस निर्णय का एक बड़ा कारण रही है।
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शिवपाल सिंह यादव
अब मट्ठा भी फूंक फूंककर पी रहे कार्यकर्ता
नई पार्टी की घोषणा के दौरान शिवपाल सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी से उपेक्षा के शिकार लोगों को मोर्चा से जोड़े जाने की बात कही है। लेकिन राजनैतिक जमीन पर उनके आह्वान के असर को लेकर संशय बरकरार बना हुआ है। तमाम ऐसे पदाधिकारी और कार्यकर्ता जो समाजवादी परिवार के आपसी खींचतान में फंसकर अब भी पार्टी की गतिविधियों से दूर रहने का मजबूर हैं। वह नई पार्टी के गठन को लेकर चुप रहने में भलाई समझ रहे हैं। वह अपने राजनैतिक नफा नुकसान का आंकलन कर रहे हैं।
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शिवपाल सिंह यादव
कई पूर्व पदाधिकारियों का कहना रहा कि वह अभी इंतजार कर रहे हैं। चुनाव के दौरान ही भविष्य की राजनीति को लेकर कोई निर्णय करेंगे। कार्यकर्ताओं को यह बात समझ में आ गई है कि शीर्ष स्तर की खींचतान में यदि वह मुखर हुए तो उनका ही नुकसान हो सकता है। इसलिए पूर्व में जो पदाधिकारी व कार्यकर्ता दूध से जल चुके हैं, अब वह मोर्चा रूपी मट्ठा को भी फूंक फूंककर पीना चाहते हैं।
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शिवपाल सिंह यादव
सपा के लिए अहितकर होगा
राजनैतिक विश्लेषक पूर्व प्राचार्य डा. विद्याकांत तिवारी मोर्चा के गठन को सपा के लिए अहितकर मानते हैं। उनका कहना रहा कि उप्र की राजनीति में इसके दूरगामी परिणाम निकलेंगे। शिवपाल सिंह यादव जमीन के कार्यकर्ता रहे हैं। मुलायम सिंह यादव ने उन्हें उंगली पकड़कर राजनीति करना सिखाया और एक तरह से जमीन राजनीति का एक तरह से उत्तराधिकारी बनाया है। इसलिए शिवपाल के हटने से समाजवादी पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर होगी।
देर से लिया निर्णय
मुलायम सिंह यादव के करीबी वरिष्ठ अधिवक्ता मेहरबान सिंह कुशवाह का मानना है कि अव्वल तो शिवपाल सिंह यादव को मुलायम सिंह यादव का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि बगैर मुलायम सिंह यादव के उन्हें इसका ज्यादा राजनैतिक लाभ नहीं मिलेगा। वह यह भी मानते हैं कि शिवपाल सिंह यादव ने जो पार्टी बनाई है, वह देर से लिया गया निर्णय है। विधानसभा चुनाव से पहले ही ले लिया होता, तो फायदा होता।