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प्रत्याशियों का चुनावी खर्च जानना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन, अलग ही है 'पर्दे के पीछे की हकीकत'

Wed, 10 Apr 2019 03:15 PM IST
शिखा पांडेय प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
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फाइल फोटो
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प्रत्याशियों के खर्च को सही-सही जान पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। दरअसल हर प्रत्याशी के दर्जनों ऐसे खर्च हैं जो चुनावी खर्च में शामिल नहीं हो पा रहे हैं। चुनाव आयोग ने प्रत्याशी के लिए खर्च की सीमा भले ही निर्धारित कर दी हो, लेकिन प्रेक्षकों के लिए इनके सभी खर्च पकड़ पाना इतना आसान नहीं है।
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पांच से 10 करोड़ रुपये के खर्च को 70 लाख की सीमा में समेट देना हर किसी के बस की बात नहीं है। खासकर प्रत्याशी के लिए तो बिलकुल नहीं है, क्योंकि उस पर हर तरफ से निगाह लगी होती है। ऐसे में प्रत्याशी के अघोषित खर्चों को मेंटेन करने की जिम्मेदारी पर्दे के पीछे से कई बड़े चार्टर्ड एकाउंटेंट निभा रहे हैं। वे तरकीब बताते हैं और प्रोफेशनल एकाउंटेंट उस पर काम करते हैं। 

फाइल फोटो
केस
कानपुर के अकबरपुर लोकसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी के समर्थन में सोमवार को 15 अलग-अलग टोलियां प्रचार के लिए निकलीं। कोई टोली पैदल प्रचार कर रही थी, कोई वाहनों से। सभी टोलियों में 15 से 25 लोग शामिल हुए। हर टोली में प्रचारकों के वाहनों का पेट्रोल भरवाया गया। चाय, पानी नाश्ता कई बार करवाया गया। फूल माला चढ़े। शाम को कई लोगों की थकावट महंगे ब्रांड की शराब से उतारी गई। कहां कितना खर्च हुआ? इसका हिसाब किसी के पास नहीं। 

फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
प्रत्याशियों पर निवेश करते हैं कोर ग्रुप के सदस्य 
प्रत्याशियों के खर्च का मैनेजमेंट संभाल रहे पार्टी पदाधिकारियों और चार्टर्ड एकाउंटेंटों की मानें तो चुनाव लड़ाने वाली कोर कमेटी के सदस्य भी अपने पास से धन खर्च करते हैं। कुछ के लिए उनका टारगेट फिक्स होता है। कुछ अपने सामर्थ्य अनुसार बिना बताए खर्च करते हैं। इस खर्च को वे प्रत्याशियों पर निवेश के तौर देखते हैं। यही वजह है कि चुनावी खर्च की कोई एक धुरी नहीं होती जिसे आसानी ने आंका जा सके।
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फाइल फोटो - फोटो : Amar Ujala
समर्थकों के समर्थक भी निभाते जिम्मेदारी
चुनाव में किसी प्रत्याशी के समर्थक बहुत सारे कामों की जिम्मेदारी अपने समर्थकों पर डाल देते हैं। इस तरह से समर्थकों के समर्थक भी लाखों रुपये अलग-अलग तरह के कामों में खर्च कर डालते हैं। इसका भी कहीं हिसाब किताब नहीं होता। इस तरह से प्रत्याशियों का चुनाव साधने के लिए पैसा लगाने वालों की पूरी चेन होती है। इसका आकलन कर पाना संभव नहीं होता।

जिसकी अनुमति उसी का आकलन
जिला प्रशासन या चुनाव आयोग के प्रेक्षक सिर्फ उन्हीं खर्चों पर निगरानी कर पाते हैं जिसकी प्रशासन से अनुमति ली गई। शहर में बड़ी संख्या में ऐसे आयोजन भी हो रहे हैं जिसमें अनुमति की जरूरत ही नहीं। लेकिन ये कार्यक्रम चुनाव में असर डालने वाले हैं। इन कार्यक्रमों से वोटरों को प्रभावित किया जाता है।

एक्सपर्ट कमेंट
चुनाव में पहले एक से 10 करोड़ रुपये तक खर्च होता था। इस धारा प्रवाह खर्च पर रोक लगाने के लिए चुनाव आयोग ने खर्च की सीमा निर्धारित की है। हो सकता है कि कुछ और खर्चे हो रहे हों लेकिन आयोग की मंशा बड़े खर्चों पर नियंत्रण की है। इसके लिए तमाम तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं। सड़कों पर कैश का आवागमन की जांच इसी का नतीजा है।
- विवेक खन्ना, चार्टर्ड एकाउंटेंट 

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