परिवार में सात पीढ़ियों तक के लोग सिर्फ पुरोहित (पूजा-पाठ) कराने का ही काम करते रहे। लेखन, कवि या फिर फिल्मों से दूर-दूर तक परिवार, दोस्त यार या किसी नजदीकी का नाता नहीं था। पिता जी सुबह पूजा-पाठ और मंत्रों का जाप करते तो मैं दूसरी तरफ रेडियो पर फिल्मी गाने सुना करता था। पिता जी ने मुझे कभी रोका-टोका नहीं। जो किया बस उसे करने दिया। इसके बाद भी हार नहीं मानी। 1999 में अमिताभ जी ने मुझे फुटपाथ से उठाकर मौका दिया तो तीन महीने तब बीते कि लग्जरी गाड़ी, बंगला सब कुछ हासिल कर लिया।
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कार्यक्रम में अमर उजाला के संपादक विजय त्रिपाठी, मनोज मुंतशिर और कैबिनेट मंत्री सतीश महाना
ये कहना है बॉलीवुड के मशहूर स्क्रिप्ट राइटर और लिरिसिस्ट मनोज मुंतशिर का। कानपुर में अमर उजाला के कार्यक्रम के दौरान अपने संघर्षों की कहानी बताते हुए मनोज मुंतशिर भावुक हो गए। उन्होंने बताया कि मुंबई में करियर बनाने के लिए घर से निकला तो डेढ़ साल तो फुटपाथ पर ही बिता दिये।
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मनोज मुंतशिर से मिलने आए उनके फैन्स
देशभर से मिलने पहुंचे फैन्स
मनोज मुंतशिर की मास्टर्स क्लास में शहर और यूपी से ही नहीं बल्कि कई प्रदेशों से युवा कुछ सीखने पहुंचे। बरेली से शेखर मिश्रा, इलाहाबाद से गौरव चंद्रा, लखनऊ से शास्वत शुक्ला, मध्यप्रदेश रीवा से दीपक सिंह, पटना से अजय प्रकाश, दिल्ली से दिव्या सहित कई जगह से युवक-युवतियां मनोज मुंतशिर की एक झलक पाने पहुंचे। सभी ने अमर उजाला की इस प्रस्तुति को सराहा।
जेके मंदिर पर हुई साहिर लुधियानवी के गीतों से मुलाकात
मनोज मुंतशिर ने बताया कि महज सात साल की उम्र में ही उनकी मुलाकात शहर के जेके मंदिर में साहिर लुधियानवी के गीतों से हुई थी। मनोज ने बताया कि जब वह सात साल के थे तो मां के साथ जेके मंदिर घूमने आए थे। मंदिर के बाहर फुटपाथ पर उन्होंने मुकेश के दर्द भरे गानों की किताब देखी और मां से लेने की जिद कर दी। तब मां ने आठ आने की किताब दिलाई तो उसमें पहला गीत ही साहिर लुधियानवी का ‘हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ था। जिससे वह बहुत प्रेरित हुए और गीत, शायरी और कविताएं लिखने के लिए आगे बढ़े। इसके बाद जैसे-जैसे वह बड़े हुए लिखने-पढ़ने का सिलसिला भी बढ़ता चला गया और आज इस मुकाम तक पहुंचे।