कहते हैं अगर मन में सच्ची श्रद्धा हो तो भगवान भी मिल ही जाते हैं। ये बात इन दिनों सच साबित हो रही है क्योंकि स्वयं भगवान भोलेनाथ ने फ्रिज में दर्शन जो दिए हैं।
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हरबंस मोहाल प्रकाश कठेरिया के घर पर फ्रिज में भगवान शिव की आकृति
- फोटो : ओ पी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
कानपुर के हरबंस मोहाल में एक घर में फ्रिज के बाबा बर्फानी ने अपने दर्शन दिए। 'बाबा बर्फानी’ दिखाई देने की सूचना इलाके में जंगल की आग की तरह फैल गई। बस फिर क्या था, उन्हें देखने के लिए लोगों का तांता लग गया। भारी संख्या में पहुंचे लोगों ने यहां पूजा-पाठ करना भी शुरू कर दिया।
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भगवान शिव की आकृति के दर्शन कर आरती करने के लिए जुटी भीड़
- फोटो : ओपी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
हरबंस मोहाल के प्रकाश कठेरिया के घर पूरे दिन जमावड़ा लगा रहा। जैसे-जैसे यह खबर फैलती गई लोग उनके घर के बाहर जुटते चले गए। बाबा बर्फानी की एक झलक मात्र पाने के लिए लोगों ने उनसे मिन्नतें की।
लोग आपस में बात करते नजर आए किस्मत वालों को ही इनके दर्शन होते हैं। कुछ लोग इसकी तुलना अमरनाथ से करने लगे। बोले जैसे अमरनाथ जाकर बाबा बर्फानी की पूजा करने वालों की मनोकामना पूरी होती है, वैसे ही यहां भी पूजा करने से मुराद पूरी होगी।
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बाबा बर्फानी से हाथजोड़ कर लोगों ने मांगी मन्नत
- फोटो : ओ पी वाधवानी, अमर उजाला, कानपुर
यहां तीन दिन पहले नवरात्र के दौरान प्रकाश कठेरिया के घर फ्रिज में भगवान शिव के सांप की आकृति बन गई। उन्होंने पहले इस पर गौर नहीं किया लेकिन बाद में जब उनका ध्यान इस और गया तो उन्होंने यह खबर परिवार को बताई।
पौराणिक मान्यता है कि भगवान शिव अपने गले में सांप को आभुषण की तरह रखते थे। शिव के ऐसे कई प्रतीक हैं जो अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए हैं जिन्हें सभी भक्तजनों को जानना चाहिए। शिव के स्वरूप का विशिष्ट प्रभाव अपनी अलग-अलग प्रकृति को दर्शाता है। तो आइए जानते हैं भगवान शिव के 9 रहस्यमयी प्रतीकों का राज...
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पैरों में कड़ा
यह अपने स्थिर तथा सुनियोजित चरणबद्ध स्थिति को दर्शाता है। योगी जन भी शिव की तरह एक पैर में कड़ा पहनते हैं। केवल इतना ही नहीं यह हमें अघोरी बाबाओं के पैरों में भी नजर आता है।
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मृगछाला: ऐसी मान्यता है कि इस पर बैठकर साधना का प्रभाव बढ़ जाता है। मन की अस्थिरता दूर हो जाती है। तपस्वी और साधक आज भी साधना के लिए मृगछाला का इस्तेमाल करते हैं।
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रुद्राक्ष: यह एक फल की गुठली है। इसका उपयोग अध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। माना जाता है रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर के आंसू से हुई थी। इसे धारण करने से सकारात्मक उर्जा मिलती है।
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नागदेवता: भगवान शिव परम योगी, परम ध्यानी व परम तपस्वी है। जब अमृत मंथन हुआ था तब अमृत कलश के पूर्व विष को उन्होंने कंठ में रखा था। जो भी विकार की अग्नि होती है उन्हें दूर करने के लिए भगवान शिव ने विषैले नागों की माला पहनी।
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खप्पर: माता अन्नपूर्णा से शिव ने प्राणियों की क्षुधा शांति के निमित्त भिक्षा मांगी थी। इसका यह आशय है कि यदि हमारे द्वारा किसी प्राणी का कल्याण होता है तो उसे प्रदान करना चाहिए।
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डमरू: संसार का पहला वाद्य है। इसके स्वर से वेदों के शब्दों की उत्पत्ति हुई इसलिए इसे नाद ब्रह्म का स्वर ब्रह्मा कहा गया।
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त्रिशूल: देवी जगदंबा की परमशक्ति त्रिशूल में समाहित है। यह संसार का परम तेजस्वी अस्त्र है। इसके माध्यम से युग-युगांतर में सृष्टि के विरुद्ध होने और सोचने वाले राक्षसों का संहार किया गया। इसमें राजस्री, सात्विक और तामस्री तीनों ही गुण समाहित है। यह समय-समय पर साधक को उपासना के माध्यम से प्राप्त होते हैं।
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शीश पर गंगा: संसार की पवित्र नदियों में से एक है गंगा। जब पृथ्वि की विकास यात्रा के लिए आव्हान किया गया तो पृथ्वि की क्षमता गंगा के आवेग को सहने में असमर्थ थी। ऐसे में भगवान शिव ने अपनी जटाओंं में गंगा को स्थान देकर सिद्ध किया आवेग की अवस्था को दृढ़ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है।
चंद्रमा: क्योंकि चंद्रमा मन का कारक ग्रह माना गया है, चन्द्र, आभा, प्रज्जवल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है, जो मन के शुद्ध विचारों से उत्पन्न होते हैं। ऐसी अवस्था में प्राणी अपने यथायोग्य श्रेष्ठ विचारों को पल्लवित करते हुए सृष्टि के कल्याण में आगे बढ़े।