रूरा और पुखरायां रेल हादसे के बाद रेल मंत्रालय की नींद उड़ी हुई है। इन हादसों से निजात दिलाने के लिए केंद्र ने साउथ कोरिया से मदद ली है। मंगलवार को साउथ कोरिया का एक दल रूरा दुर्घटनास्थल पहुंचा और बारीकी से जांच पड़ताल की। टीम ने रेल कर्मियों व अधिकारियों से भी जानकारी हासिल की। इसके बाद टीम के सदस्यों ने कहा कि पटरियां ठीक हैं, लेकिन मेटीनेंस कमजोर है। ट्रैक के आसपास फैली गंदगी से पटरियों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। मंगलवार की सुबह दिल्ली से आई दक्षिण कोरियाई की सात सदस्यीय टेक्निकल टीम रूरा स्टेशन पहुंची। सीनियर डीएनसी ने जांच टीम को स्टेशन मास्टर आफिस में कंट्रोलिंग सिस्टम व डाटा लागर से रूबरू करवाया। इसके बाद टीम ने ट्रैक, कंट्रोलिंग सिस्टम व सिग्नल प्रणाली की गहनता व बारीकी से जांच पड़ताल की। जांच टीम के साथ सीटीई चंद्र प्रकाश गुप्ता, सीनियर डीएनसी एसके गुप्ता, सीनियर डीईएन मो. शमीम आदि मौजूद रहे। इसके बाद टीम घटनास्थल पर पहुंची। जांच टीम के मुखिया क्वाक ने कहा कि ट्रैक के आसपास फैली गंदगी से पटरियों को सबसे ज्यादा नुकसान होता है। उन्होंने अपने सहयोगी हियोजुंग के साथ मिलकर घटनास्थल के ट्रैक का अल्ट्रासोनिक फ्रैक्चर डिटेक्सन टेस्ट किया। एक सवाल के जवाब में हियोजुंग ने बताया कि 23 अप्रैल सन 2004 में साउथ कोरिया में चाइना सीमा के पास रयोंगचोन स्टेशन पर भीषण ट्रेन हादसा हुआ था। इसमें 192 लोगों की मौत हुई थी। ट्रेन हादसे से सबक लेते हुए कोरियाई रेलवे विभाग ने नई कंट्रोलिंग सिस्टम प्रणाली, ट्रैक पेट्रोलिंग, सिग्नल प्रणाली आदि पर तकनीकी एक्सपर्ट से रिसर्च शुरू कराया। इसके बाद से अभी तक कोई भी रेल हादसा नहीं हुआ है।
ट्रैक खराब नहीं, सुधार की जरूरत
कानपुर पहुंची कोरिया की टीम
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कोरिया व भारत के रेलवे ट्रैक में अंतर पूछने पर बताया कि भारतीय रेलवे के ट्रैक खराब नहीं हैं, लेकिन इनमें कुछ सुधार की जरूरत है। जांच रिपोर्ट रेलवे मंत्रालय को एक सप्ताह में सौंप देंगे। जांच टीम दोपहर एक बजे आरडीएसओ लखनऊ के लिए रवाना हो गई। वहां पहले से मौजूद हादसे संबंधित साक्ष्यों की जांच पड़ताल करेगी ।
लोहे की जगह लकड़ी के स्लीपर लगाने की सलाह
हादसे की जांच करने रूरा आई कोरियाई टीम ने रेलवे पुल के नीचे लगे लोहे के स्लीपर की जगह लकड़ी के स्लीपर लगाने की बात कही। इस बात पर सीटीई चंद्र प्रकाश गुप्ता ने बताया कि पुल पर लकड़ी के स्लीपर लगाने की मनाही है। उन्होंने कहा कि नई तकनीक के विशेष कंपोजिट मेटीरियल से बने स्लीपर लगाने की योजना है। स्लीपर शॉक आब्जरवर होते हैं। आईसीएफ कोच को हटाकर एलएचबी कोच लाने की तैयारी है। एलएचबी कोच दुर्घटना के बाद एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते नहीं है। पुखरायां में इंदौर-पटना एक्सप्रेस के हादसे के बाद तमाम कोच एक-दूसरे के ऊपर चढ़ गए थे। इस कारण वहां मौतों की संख्या बढ़ी थी। इसको भी रेलवे ने गंभीरता से लिया है। कोचों की बनावट में बदलाव करने की तैयारी हो रही है। एक ट्रेन का कोच तैयार करने में तकरीबन दो करोड़ रुपये का खर्च आता है। रेलवे आधुनिक तकनीक से लैस कोच तैयार करवाएगा।
आईआईटी की तकनीक नहीं समझ पाया रेलवे
देश में कई रेल हादसे हुए। आईआईटी ने अपनी अलग से जांच की। घटना के पीछे कारण और रोकने के उपाय की रिपोर्ट से रेलवे मंत्रालय संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है। इसी कारण रेलवे विभाग ने विदेशी तकनीक की रूख किया है। सूत्रों के मुताबिक, दक्षिण कोरिया ऐसे देशों में शामिल हो गया है जहां पर 2004 के बाद कोई रेल हादसा नहीं हुआ। वहां, हाईस्पीड ट्रेनें दौड़ रही हैं।