नानाजी देशमुख, भूपेन हजारिका और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। 70वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इसका एलान किया गया है। नानाजी देशमुख और भूपेन हजारिका को मरणोपरांत भारत रत्न मिला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन तीन हस्तियों को भारत रत्न दिए जाने पर खुशी जताई है। आगे की स्लाइड में पढ़िए नानाजी देशमुख के जीवन से जुड़े किस्से...
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नानाजी देशमुख
चंडिकादास अमृतराव देशमुख एक भारतीय समाजसेवी थे। वह पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता थे। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तो उन्हें मोरारजी मत्रिमंडल में शामिल किया गया था लेकिन उन्होंने यह कहकर कि 60 वर्ष से अधिक आयु के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज सेवा का कार्य करें, मंत्री पद ठुकरा दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया था। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालंबन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिए पद्म विभूषण भी प्रदान किया।
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नानाजी देशमुख
- फोटो : डेमो
एक बार एक सम्मेलन में अटल जी के कान में एक व्यक्ति ने कुछ कहा तो अटल जी ने नाना जी देशमुख से कहा, 'मेरे पेट में दर्द हो रहा है। मैं बोल नहीं पाऊंगा। इसलिए जाना चाहता हूं।' अटल जी वहां से चले आए। पर, नाना जी भी कम नहीं, उन्होंने अटल जी के निकलते ही किसी को उनके पीछे भेज दिया। अटल जी वहां से निकलकर काफी हाऊस पहुंचे जहां लोहिया जी बैठे थे। उन्होंने लोहिया जी से बात की। कुछ देर बाद लोहिया जी उठे उन्हें दिल्ली जाना था। अटल जी भी उनके साथ चारबाग स्टेशन तक गए। लोहिया जी को गाड़ी में बैठाकर वह लौटे तो दारुलशफा में उनका सामना नाना जी से हो गया। नाना जी ने जैसे ही अटल जी को देखा तो बोले, 'अब तुम्हारे पेट का दर्द कैसा है।'
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अटलजी एवं नानाजी देशमुख
- फोटो : डेमो
अटल जी सवाल सुनकर मुस्करा दिए। नाना जी ने साथ मौजूद जनसंघ नेता पीतांबर दास से कहा, 'देखो मैं कह रहा था न कि अटल का पेट कभी खराब नहीं हो सकता। इनके पेट में मरोड़ दर्द से नहीं बल्कि लोहिया जी से मिलने की हो रही थी।' नाना के इतना कहते ही अटल जी ने भी ठहाका लगाया और बोले, 'आप सचमुच में नाना हैं।'
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डेमो पिक
संघ की पत्रिका राष्ट्रधर्म के प्रथम प्रकाशक राधेश्याम प्रसाद लिखते हैं, 'एक दिन नाना जी देशमुख मेरी दुकान पर आए और बोले, 'प्रेस आकर हिसाब-किताब तो देख लो।' उन दिनों राष्ट्रधर्म का प्रकाशन सदर बाजार से होता था। दुकान बंद करके रात में प्रेस गया। वहां देखा कि हॉल में दोनों ओर तार लगाकर कपड़े के परदों से केबिन बना दिए गए हैं। अंदर एक मेज और बरामदे में एक तख्त। गर्मियों के दिन थे। रात में काम खत्म हुआ तो दीनदयाल जी ने मुझे दरी, चादर और तकिया दे दिया।
मुझे उन लोगों से पूछने का भी ध्यान नहीं रहा और तख्त पर सो गया। प्रात: काल नींद खुली तो वहां के दृश्य देख अचंभित रह गया। आंखों में आंसू भी आ गए। दृश्य यह था कि मेरे ही बराबर नीचे जमीन पर दीनदयाल जी और अटल जी चटाई पर सो रहे थे। तकिया के स्थान पर दोनों लोगों ने अपने सिर के नीचे एक-एक ईंट लगा रखी थी। मैं हड़बड़ा कर उठा और दोनों लोगों को जगाया। फिर कहा, 'आप लोगों ने तो बड़ा अनर्थ कर दिया। ऊपर सोइए।' पं. दीनदयाल उपाध्याय बोले, 'आदत न खराब करिये।' अटल जी ने हंसते हुए कहा, 'जमीन छोड़ दी तो पैर कहां ठहरेंगे।'