दहशतगर्द विकास दुबे ने इलाके के 18 गांवों की करीब 200 बीघा जमीन कब्जा कर रखी थी। फसल पर भी वो हर सीजन में किसानों से मोटी रकम वसूलता था। बिकरू व उसके आसपास के ग्रामीणों ने पुलिस-प्रशासन के अलावा एसआईटी व न्यायिक आयोग को बताया कि विकास की दहशत के चलते वो लोग कभी भी अपने मन की फसल नहीं बोते थे। जो विकास कहता था वो ही करना पड़ता था। उसने जमीन या तो जबरन लिखवा ली या सीधे कब्जा कर लिया।
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kanpur encounter SIT
- फोटो : अमर उजाला
अगर विरोध करता तो मारा जाता
गांव निवासी जमालुद्दीन, इम्तियाज, गफूर जैसे आधा दर्जन लोगों ने न्यायिक आयोग के सामने बताया कि विकास ने किसी दो तो किसी की तीन बीघा या इससे अधिक जमीन कब्जा कर ली थी। उसके गुर्गे खेती करवाते थे या फिर बेच देते थे।
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आज तक एक पैसा नहीं दिया
गांव निवासी विश्वनाथ की चक्की है। उन्होंने बताया कि विकास के गुर्गे हर महीने कई कुंतल आटा उनकी चक्की से ले जाते थे। आज तक एक भी पैसा नहीं दिया। एक दो बार जब पैसे मांगे तो विकास के गुर्गे अमर दुबे व अतुल दुबे ने जान से मारने की धमकी दी।
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कानून व्यवस्था पर सवाल
विकास दुबे के मारे जाने के बाद जिस तरह से ग्रामीण उसके जुर्म की दास्तान बयां कर रहे हैं, उससे कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। वहीं प्रशासनिक अधिकारी भी सवालों के घेरे में हैं। कानपुर शहर से सटे गांव में तानाशाह दहशतगर्द जुर्म पर जुर्म कर रहा था और जिम्मेदारों को भनक नहीं थी।
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बिकरू गांव में जांच करने पहुंची एसआईटी की टीम
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बता दें कि सोमवार को न्यायिक जांच के लिए बिकरू गांव पहुंचे रिटायर्ड जस्टिस शशिकांत अग्रवाल ने गांव के ग्रामीणों से बातचीत की। बिकरू गांव के जमालुद्दीन ने बताया कि वह कई वर्षों से ग्राम पंचायत की दो बीघा जमीन पर खेतीबाड़ी कर अपने परिवार की गुजर बसर करते थे। लेकिन जब यह बात विकास दुबे को मालूम हुई तो उसने कुछ माह पहले ही उनकी भूमि छीनकर अपने एक साथी को दे दी।
बिकरू गांव में जांच करने पहुंची एसआईटी की टीम
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रज्जाक, गफूर ने बताया कि गांव में पंचायत चुनाव में मनमुताबिक वोट और पर्चा भरने पर पंडित (विकास दुबे) के गुस्से का सामना करना पड़ता था। इम्तियाज ने भी विकास पंडित के साथ चलने वाले कई गुर्गों का नाम लेते हुए बात-बात पर बंदूक, रायफल तान देने की बात भी बताई।