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कानपुर गोलीकांड में बड़ा खुलासा, आखिर क्यों थी ऐसी जल्दी: 11:52 बजे एफआईआर, 12:27 पर दबिश

Wed, 22 Jul 2020 09:07 AM IST
शाहरुख खान सूरज शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर
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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
कानपुर के बिकरू कांड में पुलिस ने जैसी जल्दबाजी दिखाई, आमतौर पर ऐसा कम ही देखने को मिलता है। एफआईआर दर्ज करने के महज 35 मिनट बाद ही पुलिस दबिश के लिए बिकरू गांव रवाना हो गई। कुछ ही घंटों की इस कार्रवाई में कुछ अफसरों और नेताओं के गठजोड़ की बात कही जा रही है। शहर के कई पुलिस अफसर भी दबी जुबान इस जल्दबाजी को आठ पुलिसकर्मियों की हत्या का जिम्मेदार मान रहे हैं।

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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
एक जुलाई को राहुल तिवारी को विकास दुबे और उसके गुर्गों ने पीटा था। तत्कालीन थानेदार विनय तिवारी को भी जलील किया था। दूसरे दिन राहुल तिवारी ने एसएसपी से शिकायत की। शिकायत को तुरंत संज्ञान में लिया गया। उसी रात 11:52 बजे राहुल की तहरीर पर विकास दुबे और उसके साथियों पर केस दर्ज किया गया। 
 
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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
35 मिनट बाद 12:27 बजे थाने से पुलिस विकास के घर पर दबिश देने को रवाना हुई। यहां हुई मुठभेड़ में आठ पुलिस वाले शहीद हो गए। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, तत्काल रिपोर्ट और दबिश डलवाने के पीछे किसका हाथ था, यह जांच का विषय है। यही नहीं, एफआईआर से पहले पीड़ित राहुल तिवारी का मेडिकल परीक्षण भी नहीं कराया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि बिना इसके पुलिस ने किस आधार पर धाराएं लगाईं।

 

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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
बिना पिस्टल के थे सीओ? अधूरी थी तैयारी
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि अमूमन ऐसे जमीन के विवाद में पहले जांच होती है और फिर रिपोर्ट। इसके बाद आगे की कार्रवाई होती है। वहीं अगर जांच नहीं होती है तो भी इतनी जल्द रिपोर्ट लिखकर दबिश देना संभव नहीं होता। वहां हुई वारदात से साफ है कि पुलिस की तैयारी अधूरी थी। यह भी कहा जा रहा है कि शहीद सीओ अपनी पिस्टल भी साथ नहीं ले गए थे। उधर, विकास दुबे पूरी तरह से हमले को तैयार था।
 
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Kanpur encounter - फोटो : अमर उजाला
पांच दर्जन से अधिक मुकदमे तो नया क्यों
कुख्यात विकास दुबे पर पांच दर्जन से अधिक मुकदमे वह भी संगीन धाराओं में दर्ज थे। पुलिस चाहती तो किसी भी पुराने मुकदमे की फाइल खोल लेती और उसके घर दबिश दे देती। इसके बाद भी नया मुकदमा दर्ज करना और फटाफट दबिश के लिए रवानगी भर देना पूरी कार्रवाई को सवालों के घेरे में खड़ा करता है।
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