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UP: पानी से क्रोमियम सोख लेगी 'एस्परजीलस' फंगस, जाजमऊ की मिट्टी से खोजी गई है नई प्रकार, HBTU की बड़ी उपलब्धि

Wed, 13 May 2026 04:03 PM IST
Himanshu Awasthi रजा शास्त्री, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: एचबीटीयू के वैज्ञानिकों ने जाजमऊ की मिट्टी से एस्परजीलस प्रोलीफरेंस एलए नामक फफूंदी खोजी है, जो पानी से क्रोमियम को पूरी तरह सोख लेती है। इस खोज से कानपुर के प्रभावित इलाकों के हजारों लोगों को अब शुद्ध पेयजल मिल सकेगा।
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प्रो. ललित कुमार सिंह और रनियां खानचंद्र मटियामऊ मार्ग पर डंप क्रोमियम - फोटो : amar ujala
कानपुर में गंगा किनारे बसे जाजमऊ के लोगों को शुद्ध गंगाजल मिलेगा। उन्हें टेनरी के कचरे की वजह से क्रोमियमयुक्त जहरीला पानी नहीं पीना पड़ेगा। जहां भूगर्भ जल में क्रोमियम मिल गया है, उन्हें भी राहत मिलेगी। एचबीटीयू के वैज्ञानिकों ने पहली बार ऐसी फफूंदी खोजी है, जो क्रोमियम को अपनी सतह पर सोख लेती है और पानी क्रोमियम मुक्त होकर शुद्ध हो जाता है। यह फफूंदी जाजमऊ की मिट्टी में ही खोजी गई है।

एचबीटीयू के स्कूल ऑफ फार्मास्युटिकल एंड बायोलॉजिकल साइंसेज ने इसकी खोज की है। इसके बाद फफूंदी को पुणे की नेशनल केमिकल लैबोरेट्री में भेजा गया। पता चला कि इसके पहले एस्परजीलस प्रॉलीफरेंस नाम की इस फफूंदी का किसी को पता नहीं था। इस पर इसे एस्परजीलस प्रोलीफरेंस एलए नाम दिया गया। पुणे लैब में फफूंदी को एनसीआईएम1473 कोड नंबर दिया गया।
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रनियां खानचंद्र मटियामऊ मार्ग पर डंप क्रोमियम - फोटो : amar ujala
इस फंगस को लैब में भी विकसित किया जा सकता है
यह शोध जर्नल ऑफ केमिस्ट्री एंड एनवायरमेंट और अन्य जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोध के अगुवा स्कूल ऑफ फार्मास्युटिकल एंड बायोलॉजिकल साइंसेज के डीन प्रोफेसर ललित कुमार सिंह ने बताया कि इस फंगस को लैब में विकसित किया जा सकता है। पानी में डालकर इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। फफूंदी जो क्रोमियम को सोखती है, उसे रिकवर भी कर लिया जाता है।  इसे निकालकर पानी को शुद्ध करके क्रोमियम का अन्य जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।
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रनियां खानचंद्र मटियामऊ मार्ग पर डंप क्रोमियम - फोटो : amar ujala
टेनरी के बगल के मैदान की मिट्टी से निकाली गई है फफूंदी
क्रोमियम निकालने में फफूंदी का प्रयोग करने के बाद अब पानी के दूसरे घातक धातु तत्वों को निकालने में इसका इस्तेमाल किया जाएगा। उन्होंने बताया कि क्रोमियम एस्परजीलस प्रोलीफरेंस एलए के शोध में चार साल का समय लगा है। इस शोध को और विस्तारित करेंगे जिससे लोगों को पीने के लिए शुद्ध पानी मिल सके। यह फफूंदी एक टेनरी के बगल के मैदान की मिट्टी से निकाली गई। इसके बाद इस पर कार्य किया गया, तो जल शुद्धिकरण में उपयोगिता पता चली।

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प्रोफेसर ललित कुमार सिंह - फोटो : amar ujala
एक पात्र में बगास डाली गई। उसमें एस्परजीलस प्रोलीफरेंस एलए को डालकर विकसित किया गया। जब फफूंदी विकसित हुई तो इसमें क्रोमियम युक्त पानी डाला गया। क्रोमियम के कण फफूंदी की सतह पर जम गए। जो पानी बाहर निकला, वह शुद्ध रहा। इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत तौर पर या किसी स्थान पर सामूहिक तौर पर जल शुद्धिकरण के लिए किया जा सकता है।  -प्रोफेसर ललित कुमार सिंह, डीन, एचबीटीयू
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रनियां खानचंद्र मटियामऊ मार्ग पर डंप क्रोमियम - फोटो : amar ujala
ये बीमारियां हो सकतीं
क्रोमियम के कारण त्वचा में जलन, नाक के अल्सर, फेफड़े और सांस की बीमारियां, कैंसर, त्वचा पर क्रोम अल्सर, पाचन तंत्र की समस्या, लिवर, किडनी और तंत्रिकाओं को नुकसान, अस्थमा आदि बीमारियां हो सकती हैं।
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एचबीटीयू - फोटो : amar ujala
हजारों लोग क्रोमियम युक्त पानी पीने को मजबूर
शहर में करीब 75 हजार से अधिक आबादी क्रोमियम युक्त पानी पीने के लिए मजबूर है। जाजमऊ, वाजिदपुर, नौरैयाखेड़ा, मोतीपुर, मदारपुर, प्योंदी, किसनपुर समेत आसपास के 20 गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इसके अलावा शहर के बीच में जूही बंबुरहिया, तेजाब मिल काॅलोनी आदि इलाकों के भूगर्भ जल में क्रोमियम मिला हुआ है। क्रोमियम की वजह से लोगों की सेहत खराब हो रही है। उन्हें विभिन्न प्रकार के रोग हो रहे हैं। इस पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से जाजमऊ और दूसरे इलाकों में कैंप लगाकर लोगों की जांच की गई और उनके सैंपल लिए गए। साथ ही इन क्षेत्रों के पानी के सैंपल की भी जांच कराई थी। रिपोर्ट में क्रोमियम युक्त पानी की पुष्टि हुई है।
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