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कबरई बना कब्रगाह: खनन माफिया के गुर्गे हैं पुलिस-प्रशासन के अफसर, नेताओं की चलती है हनक

Mon, 21 Sep 2020 01:35 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा सूरज शुक्ला, अमर उजाला, महोबा
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नियमों को ताक पर रख सड़क किनारे लगे क्रशर - फोटो : amar ujala
महोबा जिले में हो रहे अवैध खनन और नियमों को ताक पर रख चल रहे स्टोन क्रशर में पुलिस-प्रशासन समेत अन्य जिम्मेदार विभाग के अफसरों का पूरा साथ है। एकमुश्त रकम पहुंचने के बाद अफसर खनन माफिया के गुर्गे बन उनके इशारों पर काम करना शुरू कर देते हैं। पहाड़ियों में अवैध तरीके से धमाके होते रहते हैं। पत्थर निकलता रहता और क्रशरों पर कटता रहता है।

 
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कबरई बनी कब्रगाह - फोटो : amar ujala
अवैध खनन व स्टोन क्रशर चलाने के लिए ही अफसरों तक रिश्वत पहुंचाई जाती है। पूरा सिस्टम खनन माफिया का है या ये कहें कि महोबा समेत अन्य खनन के जिलों में खनन माफिया समानांतर सरकार चला रहे हैं। खनन माफिया और अवैध रूप से चलाने वाले क्रशर कारोबारी पुलिस-प्रशासन, खनन विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों से वर्षों से साठगांठ रखते चले आए हैं। अफसर बदलते हैं तो वहां पहले से मौजूद अन्य अधिकारी व कर्मचारी उनको पूरा खेल समझा देते हैं।

इधर अवैध काम करने वाले पूर्व की तरह रिश्वत की रकम पहुंचाते रहते हैं। पुलिस अफसरों की सेटिंग सिपाही और दरोगा कराते हैं। ये खनन माफिया, क्रशर कारोबारियों और अफसरों के बीच सेतु का काम करते हैं। इसलिए सामने से कभी अधिकारी नहीं आते हैं। एक तरह से खनन माफिया व क्रशर कारोबारी कुर्सी को रकम पहुंचाते हैं। वहां जिसकी तैनाती होगी उसको उतनी बंधी रकम मिलती रहेगी, इसलिए माफिया तय पट्टे से अधिक पहाड़ खोद डालते हैं।

 
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कबरई बनी कब्रगाह - फोटो : amar ujala
एक-एक घनमीटर की मिलती है रकम
कबरई के एक क्रशर कारोबारी के करीबी ने बताया कि पुलिस के बाद सबसे अधिक रकम प्रशासनिक अफसरों को पहुंचाई जाती है। इनके मुताबिक, प्रति घनमीटर का बीस रुपये प्रशासनिक अफसरों पहुंचना तय है। एक-एक खदान में लाखों घनमीटर खनन होता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता कि अफसरों के लिए ये पत्थर की खदानें किस कदर सोना उगल रही हैं।

ओवरलोडिंग की भी तय है उगाही
लॉकडाउन से पहले हर रोज करीब 6000 डंपर निकलते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी कम हो गई है। मगर इनके रेट नहीं गिरे हैं। हर डंपर में मानक से दो गुना पत्थर लदा होता है। इसके लिए वह पुलिस और खनन विभाग को अलग से रकम पहुंचाते हैं। एक डंपर का 3000 से 5000 हजार रुपये तक पहुंचता है। रकम देनी ही होती है, इसलिए खनन माफिया अधिक से अधिक माल लदवाकर डंपर रवाना करते हैं।
 

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कबरई बनी कब्रगाह - फोटो : amar ujala
राजनीतिक दबाव का भी चलता है खेल
पहाड़ की खदानें अधिकतर सफेदपोशों की है। लगभग सभी पार्टियों के नेता इस कारोबार में शामिल है। इससे अफसरों पर राजनीतिक दबाव भी बनाया जाता है। अगर कभी कोई अफसर काले कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने का प्रयास भी करता है तो ये नेता अपने स्तर से उसको चुप करा देते हैं।

 
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महोबा गोलीकांड - फोटो : amar ujala
नियमों को दरकिनार कर पहाड़ खोदे जा रहे हैं। मनचाही जगहों पर क्रशर लगे हैं। ये इसलिए क्योंकि अफसरों तक हर महीने बंधी रकम पहुंचती है। पैसा पहुंचते ही कानून की आंखें बंद हो जाती है। ये पैसा पुलिस, प्रशासन, खनन विभाग व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों तक पहुंचता है, इसलिए कबरई की ये दुर्दशा है।
पंकज सिंह परिहार, आरटीआई कार्यकर्ता

अवैध खनन से पूरा महोबा खासकर कबरई बर्बाद हो गया है। अधिकारियों ने खनन माफिया व क्रशर कारोबारियों से हाथ मिला रखा है। जिम्मेदार अफसर भ्रष्टाचार में लिप्त है। क्रशर कारोबारी कांड तो बस एक उदाहरण है। हमेशा से ही तय रकम अफसरों तक पहुंचती रही है।
अखिलेश उपाध्याय, पूर्व जिलाध्यक्ष, सपा प्रबुद्ध वर्ग
 
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