अवैध खनन के साथ कबरई क्रशर का गढ़ बन गया है। हर 100-200 मीटर पर एक क्रशर लगा हुआ है। नियम-कानून को ताक पर क्रशर लगाए गए हैं। पूरा कबरई क्रशरों से घिरा हुआ है। हर तरफ आसमान में पत्थरों की धूल (सिलिका डस्ट) उड़ रही है। लोगों को सांस लेना भी दूभर हो गया है। अवैध रूप से लगाए गए क्रशर दिन रात धड़ल्ले से चलते हैं।
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कबरई बनी कब्रगाह
- फोटो : amar ujala
पुलिस, प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों की आंखें बंद हैं या ये कहें कि सब कुछ देखते हुए भी खामोश हैं। इसका कारण है मोटी और एक मुश्त रकम हर महीने पहुंचना। रिश्वतखोरी चरम पर है। इसलिए कबरई समेत बुंदलेखंड के अन्य जिलों में अवैध खनन जोरों पर है और अवैध रूप से क्रशर भी चल रहे हैं। एनजीटी के मानकों को दर किनार करने वाले 200 क्रशरों को बंद करने का आदेश जारी हुआ है। उनमें से भी कई क्रशर चल रहे हैं।
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कबरई बनी कब्रगाह
- फोटो : amar ujala
हाइवे से सटे लगे हैं स्टोन क्रशर
बुंदलेखंड के जिन जिलों में पहाड़ों का खनन हो रहा है वहां पर कुल 600 स्टोन क्रशर लगे हुए हैं। इसमें अकेले महोबा में ही तकरीबन 350 क्रशर लगे हैं। जिसमें कबरई में सबसे अधिक क्रशर हैं। नियमानुसार नेशनल हाइवे से 500 मीटर दूर क्रशर लगे होने चाहिए लेकिन हकीकत इससे इत्तेफाक नहीं रखती है। यहां नेशनल हाइवे से 50-50 दूर ही क्रशर लगे मिल जाएंगे। जिसे हाइवे क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। बड़ी दुर्घटना भी हो सकती है लेकिन क्रशर कारोबारियों के सामने जिम्मेदार नतमस्तक हैं।
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कबरई बना कब्रगाह
- फोटो : अमर उजाला
कृषि भूमि को भी नहीं छोड़ा
कबरई और उसके आसपास की खेती पहले खनन और अब क्रशर की निकलने वाली सिलिका डस्ट से तबाह हो चुकी है। वहीं डंपरों की आवाजही से भी खेती लगभग खत्म सी हो गई है। अगर नियम की बात करें तो कृषिभूमि से एक किमी की दूरी पर क्रशर लगाए जाने चाहिए। मगर इस नियम का धड़ल्ले से माखौल उड़ाया जा रहा है। किसानों की जमीन लेकर कारोबारियों ने क्रशर लगाए हैं। उनको एक मुश्त रकम दे दी जाती और क्रशर कारोबारी एक तरह से जमीन मालिक बन जाते हैं।
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छावनी बना महोबा
- फोटो : amar ujala
आबादी और स्कूल भी जद में
नियमानुसार आबादी वाले इलाकों, स्कूल, हेरिटेज और वन क्षेत्र से एक किमी की दूरी पर क्रशर होने चाहिए। पर, कबरई में ऐसा नहीं है। गुगौरा चौकी पर स्थित प्राथमिक स्कूल के ठीक पीछे(तकरीबन डेढ़ सौ मीटर) क्रशर लगा हुआ है। हाइवे से भी वो इतनी ही दूरी पर है। ये हाल पूरी कबरई का है। जिधर नजर जाएगी उधर क्रशर और आसमान में धूल ही धूल नजर आएगी।
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महोबा कांड
- फोटो : amar ujala
डर से जुबान नहीं खोलना चाहते लोग
रिपोर्टिंग के दौरान कबरई व आसपास के गांव के लोगों से बातचीत की गई। हर किसी ने खनन और क्रशर के चलने से मुसीबतें गिनाईं लेकिन एक शर्त भी रख दी। उनका कहना था कि हम सब बता दे रहे हैं लेकिन अखबार में नाम, फाटो न छापना। सवाल किया गया ऐसा क्यों? तो उनका कहना था कि जीवर यहीं गुजारना है। खनन माफिया व क्रशर कारोबारी जीने नहीं देंगे। इससे पता चलता है कि इन अवैध काम करने वालों का आम लोगों के भीतर डर व्याप्त है।
ये हैं नियम:
- आबादी, स्कूल, हेरिटेज, वन क्षेत्र व कृषि भूमिक से एक किमी की दूरी पर क्रशर लगाया जाना चाहिए
- नेशनल हाइवे व अन्य मार्गों से क्रशर 500 मीटर दूरी पर लगना चाहिए
- राष्ट्रीय संरक्षित वन क्षेत्र, सेंचुरी पार्क व आर्चड से 3 किमी की दूरी पर क्रशर लगने चाहिए
- स्टोन क्रशर में वाटर स्प्रिंकलर सेट फव्वारा, टीनशेड कवर्ड, डस्ट भंडारण के लिए डस्ट हापर, टेलिस्कोपिक स्यूट का होना अनिवार्य है
- क्रशर परिसर में वृक्षारोपण और चाहरदीवारी भी जरूरी है।