बदलते माहौल में लोग इंग्लिश को अधिक महत्व देते हैं और अपनी मातृभाषा हिंदी को भूलते जा रहे। युवाओं के बीच इंग्लिश का खौफ इस कदर है कि लोग सोचते हैं कि अगर उन्हें इंग्लिश नहीं आएगी तो उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिल पाएगी। इसके चलते लोग हिंदी की बजाय अंग्रेजी को ही पढ़ना और बोलना चाहते हैं। इसी खौफ को मैंने और मेरे साथियों ने दूर करने का बेड़ा उठाया है। यह कहना है आईआईटी कानपुर के छात्र हरिकिशन का।
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आईआईटीयन हरिशंकर अपने दोस्तों के साथ पुरानी तस्वीर में
हरिकिशन ने बताया कि मैं मूलत: बिहारी के पटना शहर से हूं। ग्रामीण परिवेश से जुड़े होने के चलते बोली भी हिंदी में ही रही है। 2014 में आईआईटी कानपुर के बीटेक कोर्स में दाखिला लिया। यहां हिंदी की बजाय सभी लोग अंग्रेजी पर ही जोर दे रहे थे। कुछ दिनों तक तो मैं हैरान था लेकिन बाद में खुद को इसी माहौल में ढालने लगा। मुझे शुरू से हिंदी और हिंदी के साहित्यकार पसंद थे। कुछ दिनों बाद मालूम चला कि संस्थान में हिंदी साहित्य सभा का संचालन हो रहा है। मुझे बेहद खुशी हुई और मैं इससे जुड़ गया। यहां मुझे कुछ दोस्त मिले जो मेरी ही तरह हिंदी से प्रेम करते थे।
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डेमो पिक
हम लोगों ने तय किया की हिंदी भाषा की मिठास से आईआईटी के हर छात्र को रूबरू कराएंगे। यही नहीं आस-पास के छोटे बच्चों को भी हिंदी की जरूरत और महत्व बताएंगे। हम सभी ने मिलकर एक अभियान जैसा शुरू कर दिया। हर सप्ताह कोई न कोई आयोजन कराते। हिंदी माध्यम के कवियों के बारे में लोगों को बताने लगे। आस-पास के गांवों में जाकर बच्चों को हिंदी की शिक्षा देते।
हिंदी साहित्यकारों की खूबियां बताते और उनकी रचनाओं से बच्चों को रूबरू कराते। हमारी इस मुहिम को देख अंग्रेजी माध्यम के कई छात्र-छात्राएं भी जुड़ गए। आज हम लोग बड़े पैमाने पर तमाम आयोजन कराते हैं जिससे हिंदी का प्रचार-प्रसार हो और लोग इस भय से मुक्त हो पाएं कि केवल अंग्रेजी ही उन्हें अच्छी नौकरी दिला सकती है।