जहर बांटती मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला। जब-जब पूछा वृद्घाें से एक यही उत्तर पाया। अब न रहे वाे पीने वाले, अब न रही वाे मधुशाला... याद है न ये लाइनें? जी हां, अाप सही समझ रहे हैं। डा.हरिवंश राय बच्चन की लिखि इस कविता ने दुनियाभर के लाेगाें काे कायल बना डाला था। अाज भी मधुशाला की पंक्तियां लाेगाें के जेहन में माैजूद है। 27 नवंबर 1907 में डा.बच्चन का जन्म हुअा था अाैर 18 जनवरी 2003 में वह इस दुनिया काे अलविदा कह गए। अाइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी उन बाताें काे जाे बहुत ही कम लाेग जानते हैं....
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डा.हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, कानपुर
अापकाे जानकर यह हैरानी हाेगी की दुनिया के बेहतरीन कवियाें में शुमार डा.बच्चन के परिवार के लिए एक समय एेसा भी अाया जब उन्हें घर छाेड़ सड़क किनारे रहने काे मजबूर हाेना पड़ा था। इस बात की भविष्यवाणी एक सन्यासी ने बहुत पहले ही कर दिया था।
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डा.हरिवंश राय बच्चन की जयंती
- फोटो : अमर उजाला, कानपुर
हरिवंश राय बच्चन के पूर्वज बस्ती जनपद के अमाेढ़ा नामक गांव के रहने वाले थे। करीब दाे ढा़ई साै साल पहले वहां से सभी कायस्थ गांव छाेड़कर चले गए ताे बच्चन के पूर्वजाें काे भी घर छाेड़ना पड़ गया था। इसके बाद उन्हाेंने प्रतापगढ़ के रानीगंज तहसील (तब पट्टी था) के बाबूपट्टी गांव काे अपना नया ठिकाना बनाया। यहां हरिवंश राय बच्चन के पिता के छठी पीढ़ी के सबसे बुजुर्ग मनसा रहा करते थे जाे बेहद गरबी में अपना जीवन बीता रहे थे। ं
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डा.हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, कानपुर
उन्हें किसी ने बताया कि इलाहाबाद के तिलहर गांव गांव में रामानंद संप्रदाय की गद्दी के अाचार्य की शरण में जाने से सारे दुख दूर हाे जाएंगे। इतना सुनते ही मनसा सबकुछ छाेड़ इलाहाबाद के लिए अपनी पत्नी संग पैदल ही निकल गए। गद्दी पहुंचकर तीन दिन रूके। गुरू महाराज से गुरू दीक्षा ली अाैर फिर निकल पड़े। गुरू महाराज ने उन्हें तीन बर्तन दिए अाैर बाेले, जबतक यह बर्तन तुम्हारे पास रहेंगे तब तक तुम्हारा कुटुंब कभी अन्न-धन का कष्ट नहीं भाेगेगा। बाेले, जहां से तुम्हारा पांव अागे न बढ़े वहीं अपनी झाेपड़ी बना लेना।
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डा.हरिवंश राय बच्चन
- फोटो : अमर उजाला, कानपुर
बर्तन लेकर वह पत्नी संग निकल पड़े। बीच में प्रयाग में थककर एक मंदिर के पास दाेनाें बैठ गए। यहीं रात गुजारी अाैर सुबह तक मंदिर के एक हिस्से पर अपनी झाेपड़ी तान ली। 1926 में छठे पुश्त के रूप में हरिवंश राय बच्चन के पिता प्रतापनारायण का समय अाया। हरिवंश दाे भाइयाें में बड़े थे। यही वह समय था जब उन्हें बेघर हाेना पड़ा था। उस दाैरान उनके घर से ही हाेकर सड़क बननी थी। मजबूरन बच्चन परिवार काे अपना घर छाेड़कर दूसरे के घर में बताैर किराएदार रहना पड़ा। यहीं रहकर उन्हाेंने अपनी पढ़ाई भी पूरी की।