यूपी के उरई-जालौन जिले में जाजेपुरा गांव में हिंदू-मुस्लिम मिलकर दिवाली और ईद की खुशियां एक साथ मनाते हैं। सभी अपने घरों की साफ सफाई करते हैं। यही वजह है कि सोमवार को घर लीपने के लिए परिजनों ने अपनी बच्चियों को मिट्टी खोदने के लिए भेजा था, क्या पता था कि अब नगमा और आशिकाना कभी जीवित घर लौट कर नहीं आएंगी। चचेरी बच्चियों की दर्दनाक मौत से पूरे गांव में मातम छा गया। त्योहार की खुशियां भी उसी मातम में डूब गई। हर घर के महिला पुरुष की आंखें नम थीं और बच्चों के चेहरे मुरझाए हुए थे। नगमा और आशिकाना चचेरी बहनें थी। लिहाजा दोनों ही परिवारों में जहां रोजाना बच्चों का शोरगुल सुनाई देता था, वहां पूरे दिन चीख पुकार मची रही। दोनों बच्चियों ने अपने लिए पटाखे भी मंगाकर रखे थे, जिन्हें देखकर घर की महिलाएं बदहवास हो रही थीं। ग्रामीणों का कहना है कि किसी ने सोचा भी न था कि त्योहार के दिन दर्दनाक हादसा हो जाएगा।
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मलबे को हटाती जेसीबी
- फोटो : अमर उजाला
जाजेपुरा में बच्चियों के टीले में दबने की यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले 2016 में मिट्टी खोदते वक्त टीला धंसने से दो महिलाओं कमला और राजकुमारी की मौत पर भी गांव चीखों से गूंज उठा था। इसके बाद 2017 में तीन लड़कियां मिट्टी खोदते वक्त टीला ढहने से मलबे में दब गईं थीं। जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं थीं।
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मौके पर मौजूद पुलिस
- फोटो : अमर उजाला
ग्राम प्रधान राजकुमार राठौर ने बताया कि कई बार गांव के लोगों को चेता चुके हैं कि इस तरह लापरवाही से मिट्टी की खुदाई न की जाए। इसके लिए कई बार मुनादी भी कराई जा चुकी है। फिर भी बच्चों के हाथों से मिट्टी की खुदाई कराने की लापरवाही की जा रही है।
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थाने में बच्चियों के परिजन दादा युनूस
- फोटो : अमर उजाला
पूरे गांव में हादसे के बाद चीख पुकार मच गई। पुलिस तो जेसीबी के साथ मौके पर पहुंच गई लेकिन प्रशासन का कोई अधिकारी देर शाम तक पीड़ित परिवार की सुध लेने नहीं पहुंचा। इससे ग्रामीणों में रोष है। ग्रामीणों का कहना था कि बच्चियों के परिजनों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि एक तो प्रशासन अवैध मिट्टी खनन पर रोक नहीं लगा पा रहा है। उस पर जब कहीं कोई हादसा होता है तो अधिकारियों का मौके पर न पहुंचना और गलत है।