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महंगी हुई पढ़ाईः आठ से 10 फीसदी तक बढ़ी स्कूल फीस और कॉपी-किताबों के दाम

Tue, 03 Apr 2018 05:00 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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कापी-किताबों पर महंगाई की मार, अभिभावक लाचार
स्कूलों में बच्चों एडमीशन के साथ ही अभिभवकों को कापी-किताबें खरीदने की टेंशन बढने लगी है। इन कापी-किताबों की कीमतें हर साल आठ से दस फीसदी तक बढ़ जाती हैं। वहीं कापी-किताबों को निश्चित दुकान से खरीदने की बाध्यता भी अभिभावकों को बेचैन करती है।
 
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1300 रुपये का पैकेट थमाया गया

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हर साल बढ़ रही है आठ से दस फीसदी कीमतें
स्कूलों में प्रवेश प्रक्रिया चल रही है। शिक्षा सत्र एक अप्रैल से प्रारंभ हो चुका है। इस बीच किताबों को खरीदने के लिए दुकानों पर अभिभावकों की भीड़ लग रही है। कापी-किताबों के रेट दिमाग पर पारा चढ़ा रहे हैं। क्लास फर्स्ट में पढ़ रही बिटिया के किताबें खरीदने आए रवि सचान ने बताया कि इस बार 1300 रुपये का पैकेट थमाया गया है।
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अभिभवकों को कापी-किताबें खरीदने की टेंशन बढने लगी
जबकि पिछली बार बड़े बच्चे को प्रथम क्लास की किताबें 1150 रुपये में खरीदीं थी। महिला सुनीता देवी ने बताया कि एक ही क्लास की किताबें अलग-अलग स्कूलों के लिए अलग-अलग कीमतें हैं ये समझ से बाहर है। स्कूल संचालक किताबों को खरीदने के लिए निश्चित दुकान से ही खरीदने को बाध्य करते हैं। बुंदेलखंड हमीरपुर के किताब विक्रेता जितेंद्र कुमार ने बताया कि हर साल करीब आठ से 10 फीसदी तक की वृद्धि हो जाती है।

एक साल में इतनी बढ़ गई फीस

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कापी-किताबों पर महंगाई की मार, अभिभावक लाचार
कक्षा पिछली साल इस साल
प्रथम 1025 1100
द्वितीय 1010 1100
तृतीय 1090 1215
चतुर्थ 1750 1982
पंचम 1800 2042
षष्ठ 2100 2448
सप्तम 2200 2577
अष्टम 2300 2637
(कीमत रुपये में)
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स्कूल संचालकों की मनमानी से अभिभावक परेशान

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हर साल करीब आठ से 10 फीसदी तक की वृद्धि हो जाती है।
किताबों के प्राइवेट प्रकाशक और स्कूल संचालकों की साठगांठ ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। एनसीईआरटी की किताबों के साथ ही इन प्रकाशकों की किताबों को जबरन कई गुना कीमतों पर अभिभावकों को बेचा जा रहा है। सारा खेल कमीशन का है और स्कूल संचालक इस खेल में शामिल हैं। आधुनिक स्टोर के दुकानदार जितेंद्र कुमार ने कहा कि स्कूल संचालकों ने हर बच्चे को किताब लेने के साथ हर विषय की गाइड लेना अनिवार्य कर दिया है। इसके चलते अभिभावकों पर पैसे का अधिक भार पड़ रहा है। कई कमजोर तबके अभिभावक तो आधी अधूरी ही कापी-किताबें खरीदकर बच्चों को फिर खरीद देने का वादा करते दिखे।
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