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नोट आय गे तो संस्कार भूलि गे.. संवेदनहीन हुई गे- राजू श्रीवास्तव

Mon, 29 Jul 2019 12:25 PM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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राजू श्रीवास्तव
दोस्तों पहिले केर बात अलग रही.. जब हम छोट रहन तो बीघापुर गांव मा रहत रहन.. उई  टाइम जब पता चलत रहा कि बुआ आय रही हैं तो अईस तैयारी होत रही कि जानो छोट त्यौहार हुई गा.. पूरे घरे मा भाग दौड़ मचि जात रही.. बच्चन मा हुल्लड़ मचत रही कि बुआ के ले हमहूं चलब स्टेशन.. तो डांट पड़त रही कि ट्रेन रात मा आई.. तुम लोगे का करिहौ टेसन जाय के.. पता चला रात मा सबै लोगे टेसन जाय के लिए बैलगाड़ी मा सवार भये..
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राजू श्रीवास्तव
तबहीं हमरे पड़ोसी पुत्तू आय गे कि हमहूं चलब.. हम कहा तुम्हरी बुआ हैं का.. तो पुत्तू कहिन कि तुम्हरी बुआ समझो हमरी बुआ.. दोस्तों अईस मेल ब्यवहार रहा उई टाइम मा.. खैर हमका याद आय कि जब हम सब लोगे दुई बैलगाड़ी मा भरि के बुआ का टेसन से लई के वापस आत रहेन तो करीब रात के बारह एक बजा होई.. हल्की हल्की सर्दी केर टाइम रहा.. गांव जाय वाली सड़क एकदम सुनसान.. खाली बैलगाड़ी केर आवाज सुनाई देत रही.. चुर्रर चूं चुररर.. माहौल एकदम डरावना रहा.. सियार अलग चिल्लावत रहैं..
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राजू श्रीवास्तव
तबहीं पुत्तू बोलि पड़े.. आजकाल कच्छा गिरोह केर आतंक चरम पे आय.. अभीन कलै लालगंज मा दुई राहजनी भई हैं.. बहुत जालिम गिरोह आय.. लूट के जान से मारि देत है.. ई पक्की पुलिया पार हुई गे तो समझो सब कुशल आय.. हम कहा यार अईस बातैं ना करौ.. खैर हम सबै बुआ का लई के सुरक्षित घरे पहुंचि गेन.. फिर सुरु भा उत्सव.. सुबह बनत रही खीर पूड़ी तो दुपहरी मा पनीर केर सब्जी अउर परांठे.. रोज बढ़िया बढ़िया व्यंजन बनत रहें.. अब आजकाल लोगे आपन बुआ से कटत हैं..

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राजू श्रीवास्तव
खीर पूड़ी केर जगह पिज़्जा, बर्गर अउर मोमो लई लिहिन हैं.. उई ज़माना अलग रहा.. हमका याद है गरमी केर छुट्टी मा जब हम आपन ननिहाल जात रहे तो मामा-मामी, नाना-नानी हम लोगन का अईस हाथों हाथ लेत रहे कि का बताई.. गरमी केर छुट्टी मा ननिहाल जाय के जौने आम खवाई होत रही उई सब बीते ज़माने केर बात हुई गयी.. उई जमाने मा तो हम लोगे सीधे आम केर बाग़ मा जात रहेन अउर जौने आम चुई के गिरत रहा.. ओका उठाय के चोंपी निकारि के दुई बूंद रस चुवाय के डायरेक्ट चूस लेत रहेन..
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Raju Srivastav
फिर झौवा मा आम भरि के घर लावा जात रहा अउर बड़ी सी हौदिया मा डारि के पानी मा भिगो दिया जात रहा.. फिर पूरे परिवार संगे बईठ के जौने आम सुताई होत रही कि का बताएं.. अईस आम खवाई होत रही कि आम केर रस कोहनी से चुवत रहा.. आजकाल लोगे एक दुई आम खात हैं.. वहू छील काटि के कांटे से खावत हैं.. आम का छुवे भी नाहि चाहत हैं.. पहिले केर जमाना अलग रहा.. हम लोगे नाना-नानी, मामा-मामी पे हक़ जमात रहैं.. अब ई सब रिश्ते औपचारिक हुई गे.. पहिले एक्कै तौलिये से पूरा परिवार नहात रहा..
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राजू श्रीवास्तव
अब सबकी तौलिया अलग होत है.. पहिले मां बाप से डर लगत रहा.. अब मां बाप डरत हैं.. पहिले भाई बहन से प्रेम अउर लगाव रहा.. अब भाइयों से दूरी अउर बहन से प्रेम कम हुई गा.. बहन खाली रक्षाबंधन पे याद आत है.. हमका याद आय कि तब हम लोगन केर दिवाली दिवाली नए कपडे़ बनत रहे.. हमार दद्दा कपडे़ केर लट्ठा लात रहें अउर वही लट्ठे से पूरा परिवार निपट जात रहा.. एक्कै डिजाईन अउर कलर केर कपडे़ पहिने हम सबै भाई बहन अईस लगत रहे जानो कौनो बैंड बाजे वाले जाय रहे होयं..
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राजू श्रीवास्तव
अच्छा हम तीन भाईयन से छोट रहन तो हम इन्तेजार करत रहन कि जल्दी से बड़े भाई की बुशर्ट छोट हुई जाय तो हमका मिले.. आजकाल सबकी बुशर्ट पेंट अलग है.. सबका कपड़ा अलग आय.. चलो कपड़ा अलग है तो कौनो बात नाही.. मगर आजकाल तो सबके ब्यवहार अउर सोच भी अलग हुई गे.. पहिले धन का महत्व के बारे मा कौनो सोचत भी नाही रहा.. अउर अब पईसा ही सब कुछ आय.. धन प्रमुख हुई गा.. बटुवे मा नोट आय गे तो संस्कार भूलि गे.. लोगे संवेदनहीन हुई गे.. रिश्तन के अर्थ बदलि गे.. बहुत कुछ पाय गे मगर बहुत कुछ से भी जादा खोय दिए.. लास्ट मा एक्कै बात कहे चाहित है.. कि हमरी बात ध्यान से सुना करौ.. काहे से हमरे घर में हमरी कोई सुनत नहीं है...
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